Class 12 Previous Year Samanya Hindi Question Paper UP Board – कक्षा-12सामान्य हिंदी गद्यांश पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न

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Class 12 Previous Year Samanya Hindi Question Paper – सामान्य हिंदी कक्षा-12 गद्यांश पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न :

इस पोस्ट में मैंने 12वी सामान्य हिन्दी, यूपी बोर्ड इंटरमीडिएट (Class 12 Previous Year Samanya Hindi Question Paper)  सामान्य हिंदी गद्यांश पर आधारित प्रश्न को बताया है। जो बोर्ड परीक्षा में पिछले 2019 से लेकर अब तक पूछें गये है। यहां दिये गये सभी प्रश्न सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रश्न पिछले कई वर्षों से लगातार यूपी बोर्ड परीक्षा में पूछा जा रहा है। इसलिए यहां दिए गए सभी प्रश्नों को जरूर तैयार कर ले। Class 12 Previous Year Samanya Hindi Question Paper

 

UP Board Class 12 Previous Year Samanya Hindi Question Paper - यूपी बोर्ड कक्षा-12 सामान्य हिंदी गद्यांश पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न
UP Board Class 12 Previous Year Samanya Hindi Question Paper

 

दिए गए गद्यांश पर आधारित निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

गद्यांश -1

भूमि का निर्माण देवों ने किया है; वह अनन्त काल से है। उसके भौतिक रूप, सौन्दर्य और समृद्धि के प्रति सचेत होना हमारा आवश्यक कर्त्तव्य है। भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितने अधिक जागरूक होंगे, उतनी ही हमारी राष्ट्रीयता बलवती हो सकेगी। यह पृथ्वी सच्चे अर्थों में समस्त राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी है। जो राष्ट्रीयता पृथ्वी के साथ नहीं जुड़ी वह निर्मूल होती है। राष्ट्रीयता की जड़ें पृथ्वी में जितनी गहरी होंगी, उतना ही राष्ट्रीय भावों का अंकुर पल्लवित होगा। इसलिए पृथ्वी के भौतिक स्वरूप की आद्योपांत जानकारी प्राप्त करना, उसकी सुन्दरता, उपयोगिता और महिमा को पहचानना आवश्यक धर्म है।

(क) भूमि का निर्माण किसने किया है और यह कब-से है?

उत्तर- भूमि का निर्माण देवताओं ने किया है और यह अनंत काल से अर्थात यह सदियों से चली आ रही है।

(ख) भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति जागरूक रहने का परिणाम क्या होगा?

उत्तर- भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति जागरूक रहने का परिणाम यह होगा कि हम भूमि के आर्थिक स्वरूप के प्रति जितना अधिक जागरूक रहेंगे हमारी राष्ट्रीयता की भावना उतनी ही बलवती रहेगी।

(ग) लेखक पृथ्वी को सच्चे अर्थों में क्या मानता है?

उत्तर- लेखक पृथ्वी को सच्चे अर्थों में हमारी समस्त राष्ट्रीय विचार धाराओं की जननी मानता है। कोई भी राष्ट्रीयता यदि अपनी भूमि से नहीं जुड़ी है तो वह राष्ट्रीयता की भावना निराधार होती है।

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – लेखक का मानना है कि पृथ्वी अर्थात जन्मभूमि की आरंभ से अंत तक जानकारी प्राप्त करना, उसकी सुधरता, उपयोगिता एवं महिमा को पहचानना आदि हमारे लिए न केवल आवश्यक है बल्कि अपरिहार्य है, क्योंकि यह हमारा धर्म है, हमारा कर्तव्य है। 

(ङ) पाठ का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर- पाठ का शीर्षक राष्ट्र का स्वरूप है तथा लेखक का नाम डॉक्टर वासुदेव शरण अग्रवाल है। ‌

 

गद्यांश-2

भाषा का सौधा सम्बन्ध प्रयोग से है और जनता से है। यदि नए शब्द अपने उद्गम स्थान में ही अड़े रहे और कहीं भी उनका प्रयोग किया नहीं जाए तो उसके पीछे के उद्देश्य पर ही कुठाराघात होगा। इसके लिए यूरोपीय देशों में प्रेषण के कई माध्यम हैं: श्रव्य दृश्य विधान, वैज्ञानिक कथा-साहित्य आदि। हमारी भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक कथा साहित्य प्रायः नहीं के बराबर है। किसी भी नए विधान की सफलता अन्ततः जनता की सम्मति व असम्मति के आधार पर निर्भर करती है और जनता में इस चेतना को उजागर करने का उत्तरदायित्व शिक्षित समुदाय एवं सरकार का होना चाहिए।

(क) भाषा का सीधा सम्बन्ध किससे है?

उत्तर- भाषा का सीधा संबंध प्रयोग से है और जनता से है।

(ख) यूरोपीय देशों में शब्द-प्रेषण के माध्यम कौन-कौन से है?

उत्तर –

(ग) ‘कुठाराघात’ और ‘प्रेषण’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –‘कुठाराघात’का आशय ‘घातक परिणाम’ या ‘घातक चोट’ है।

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ङ) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम बताइए।

उत्तर – गद्यांश का शीर्षक भाषा और आधुनिकता है तथा इसके लेखक प्रो.जी. सुंदर रेड्डी है।

 

गद्यांश-3

निन्दा का उद्गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निन्दा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है। उसके अहं की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बड़ी बनती है। ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। कठिन कर्म ही ईष्यों-द्वेष और इससे उत्पन्न निन्दा को मारता है। इन्द्र बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है; क्योकि वह निठल्ला है। स्वर्ग में देवताओं को बिना उगाया अन्न, बे-बनाया महल और बिन बोये फल मिलते हैं। अकर्मण्यता में उन्हें अप्रतिष्ठित होने का भय बना रहता है, इसलिए कर्मी मनुष्यों से उन्हें ईर्ष्यार्थ्यां होती है।

(i) निन्दा का उद्गम किससे होता है?

उत्तर – निंदा का उद्गम हीनता और कमजोरी से होता है।

(ii) देवताओं को कर्मी मनुष्यों से क्यों ईर्ष्या होती है?

उत्तर –लेखक के अनुसार देवताओं को कर्मी मनुष्य से ईर्ष्या इसलिए होती है, क्योंकि वह अकर्मण्य होते हैं।

(iii) कर्म के क्षीण होने पर किसकी प्रवृत्ति बढ़ जाती है?

उत्तर – 

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – लेखक कहता है कि मनुष्य के हीन भावना और उसकी कर्महीनता से निंदा का जन्म होता है। जब व्यक्ति में हीनता की भावना प्रवेश कर जाती है, तब वह आलसी हो जाता है और उसकी कर्म शक्ति क्षीण हो जाती है। तब वह निंदा का आश्रय लेकर स्वयं को ऊंचा दिखाने का प्रयास करता है और अपनी हीनता छुपाने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार व्यक्ति आत्महीनता के बोझ से दबा रहता है। हीन भावना से ग्रस्त व्यक्ति दूसरों की निंदा करके तथा उन्हें तुच्छ और निकृष्ट बताकर अपने अहं की तुष्टि करते हैं। हवे समझते हैं कि इस प्रकार वे समाज में अपने महत्व की स्थापना कर रहे हैं।

(v) पाठ का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर – इस पाठ का शीर्षक ‘निंदा रस’ है तथा इसके लेखक ‘हरिशंकर परसाई’ है।

 

गद्यांश-4

अशोक का वृक्ष जितना भी मनौहर हो, जिनता भी रहस्यमय हो, जितना भी अलंकारमय हो, परन्तु है वह उस विशाल सामन्त सभ्यता की परिष्कृत रुचि का ही प्रतीक, जो साधारण प्रजा के परिश्रमों पर पली थी, उसके रक्त के संसार कणों को खाकर बड़ी हुई थी और लाखों करोड़ों की उपेक्षा से जो समृद्ध हुई थी। वे सामन्त उखड़ गए और दिनोत्सव की धूमधाम भी मिट गई।

(1) सामन्त सभ्यता की परिष्कृत रुचि का प्रतीक कौन है?

उत्तर- सामन्त सभ्यता की परिष्कृत रुचि का प्रतीक अशोक का वृक्ष है। 

(ii) लाखों करोड़ों की उपेक्षा से कौन समृद्ध हुई थी?

उत्तर – लेखक के अनुसार लाखों करोड़ों की उपेक्षा से सामंतवाद समृद्ध हुआ था।

(iii) आज उस सामन्ती सभ्यता की क्या स्थिति है?.

उत्तर – लेखक के अनुसार आज सामंती सभ्यता की स्थिति यह है कि वह उखड़ गए हैं। उनका समाज ढह गया है और उनके विलासितापूर्ण जीवन की धूमधाम मिट गई है।

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – लेखक का कहना है कि संसार का नियम है कि जो वस्तु अथवा परंपरा है, वह समय के साथ परिवर्तन होता ही है। कुछ समय पश्चात उसके स्वरूप में आमूलचूल परिवर्तन होकर वह एक भिन्न रूप में हमारे सामने होती है। यही बात संस्कृति के संदर्भ में भी होती है। यही कारण है कि कभी सम्राटों और सामंतों ने जिस बिलासी और चाटुकार संस्कृति को जन्म दिया था, वह मां को लुभाने वाली और व्यक्ति को उम्मत करने वाली संस्कृति धीरे-धीरे समाप्त हो गई।

(v) पाठ का शीर्षक तथा लेखक का नामोल्लेख कीजिए।

उत्तर – पाठ के शीर्षक का नाम अशोक के फूल तथा लेखक का नाम डॉक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी है।

 

गद्यांश-5

भूमि का निर्माण देवों ने किया है, वह अनन्तकाल से है। उसके भौतिक रूप, सौन्दर्य और समृद्धि के प्रति सचेत होना हमारा आवश्यक कर्तव्य है। भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितने अधिक जागरूक होगे, उतनी ही हमारी राष्ट्रीयता बलवती हो सकेगी। यह पृथिवी सच्चे अर्थों में समस्त राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी है। जो राष्ट्रीयता पृथिवी के साथ नहीं जुड़ी वह निर्मूल होती है। राष्ट्रीयता को जड़े पृथिवी में जितनी गहरी होंगी, उतना ही राष्ट्रीय भावों का अंकुर पल्लवित होगा। इसलिए पृथिवी के भौतिक स्वरूप की आद्योपांत जानकारी प्राप्त करना उसकी सुन्दरता, उपयोगिता और महिमा को पहचानना आवश्यक धर्म है।

(i) राष्ट्र भूमि के प्रति हमारा आवश्यक कर्त्तव्य क्या है?

उत्तर – राष्ट्रीय भूमि के प्रति हमारा आवश्यक कर्तव्य यह है कि इस भूमि के भौतिक स्वरूप, उसके सौंदर्य एवं समृद्धि के प्रति हमें सतर्क एवं जागरूक रहना चाहिए।

(ii) किस प्रकार की राष्ट्रीयता को लेखक ने निर्मूल कहा है?

उत्तर- जो राष्ट्रीयता अपने धरती से नहीं जुड़ी हो, उसे लेखक ने निर्मूल कहा है क्योंकि राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी पृथ्वी यानी धरती है।

(iii) यह पृथिवी सच्चे अर्थों में क्या है?

उत्तर-यह पृथ्वी सच्चे अर्थों में समस्त राष्ट्रीय विचार धाराओं की जननी है अर्थात हमारे सभी विचारधाराओं का जन्म पृथ्वी से ही होता है।

(iv) रेखांकित वाक्यांश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर-लेखक का मानना है कि किसी भी राष्ट्र की राष्ट्रीयता की जड़े जितना अधिक पृथ्वी से जुड़ी होगी। उस राष्ट्र की राष्ट्रीयता की भावनाओं का अंकुर उतना ही अधिक फलेगा फूलेगा। गाने का अर्थ क्या है कि यदि हमें अपनी जन्मभूमि से लगाव नहीं है, उसके प्रति प्रेम नहीं है, तो हमारे अंतरराष्ट्रीयता की भावना कभी भी दृढ़ नहीं हो सकती। हमें अपने देश की धरती से प्रेम रखना चाहिए। यदि हमारे अंदर अपने राष्ट्र के प्रति लगाव है, तो हमें अनिवार्य रूप से अपनी जन्मभूमि के प्रति भी लगाव होगा अन्यथा राष्ट्रीयता की यह भावना खोखली होगी।

(v) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर- पाठ का शीर्षक राष्ट्र का स्वरूप और लेखक का नाम डॉक्टर वासुदेव शरण अग्रवाल है।

 

गद्यांश-6

भाषा की साधारण इकाई शब्द है, शब्द के अभाव में भाषा का अस्तित्व ही दूरुह है। यदि भाषा में विकासशीलता शुरू होती है तो शब्दों के स्तर पर ही। दैनंदिन सामाजिक व्यवहारों में हम कई ऐसे नवीन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जो अंग्रेजी, अरबी, फारसी आदि विदेशी भाषाओं से उधार लिए गए हैं। वैसे ही नए शब्दों का गठन भी अनजाने में अनायास ही होता है। ये शब्द अर्थात् उन विदेशी भाषाओं से सीधे अविकृत ढंग से उधार लिए गए शब्द, भले ही काम चलाऊ माध्यम से प्रयुक्त हों, साहित्यिक दायरे में कदापि ग्रहणीय नहीं। यदि ग्रहण करना पड़े तो उन्हें भाषा ही मूल प्रकृति के अनुरूप साहित्यिक शुद्धता प्रदान करनी पड़ती है।

(i) भाषा की विकासशीलता कैसे शुरू होती है?

उत्तर- लेखक के अनुसार भाषा की विकासशीलता शब्दों के स्तर पर ही शुरू होती है।

(ii) ‘अविकृत ढंग’ और ‘मूल प्रकृति’ का क्या आशय है?

उत्तर- ‘अविकृत ढंग’ और ‘मूल प्रकृति’ का आशय है विदेशी भाषाओं के अवीकृत स्वरूप और भाषा का वास्तविक स्वरूप।

(iii) साहित्यिक दायरे में विदेशी भाषा के शब्दों को किस रूप में ग्रहण करना पड़ता है?

उत्तर- साहित्यिक दायरे में विदेशी भाषा के शब्दों को भाषा के मूल प्रकृति के अनुरूप ग्रहण करना पड़ता है।

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- लेखक कहते हैं कि शब्द किसी भाषा के मूलभूत इकाई है। इसके अभाव में भाषा का अस्तित्व संभव है। वस्तुत: किसी भी भाषा का विकास शब्द के स्तर से ही आरंभ होता है। भाषा में शब्दों का आगम अथवा निर्माण अनायास और साशय दोनों विधियो से होता है। अनायास विधि में तो किसी वस्तु पदार्थ अथवा क्रिया को देखकर जो ध्वनि हमारे मुख से उत्पन्न होती है वही कालांतर में उस वस्तु पदार्थ तथा क्रिया के रूप में रूढ़ होकर उसके लिए नाम शब्द के रूप में प्रयुक्त होने लगती है। इस प्रकार एक नए शब्द का आगम अथवा निर्माण भाषा में हो जाता है।

(v) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर- इस गद्यांश के पाठ का शीर्षक भाषा और आधुनिकता है तथा इसके लेखक प्रो. जी. सुंदर रेडी है।

Class 12 Previous Year Samanya Hindi Question Paper

गद्यांश-7

मातृभूमि पर निवास करने वाले मनुष्य राष्ट्र का दूसरा अंग हैं। पृथिवी हो और मनुष्य न हों तो राष्ट्र की कल्पना असंभव है। पृथिवी और जन दोनों के सम्मिलन से ही राष्ट्र का स्वरूप सम्पादित होता है।

जन के कारण ही पृथिवी मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है। पृथिवी माता है और जन सच्चे अर्थों में पृथिवी के पुत्र हैं।

(i) राष्ट्र की कल्पना कब असंभव है?

उत्तर- यदि पृथ्वी हो और मनुष्य ना हो तो राष्ट्रीय की कल्पना संभव है।

(ii) पृथिवी और जन दोनों मिलकर क्या बनाते हैं?

उत्तर- पृथ्वी और जन दोनों मिलकर राष्ट्र के स्वरूप को संपादित करते हैं।

(iii) पृथ्वी कब मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है?

उत्तर- पृथ्वी मातृभूमि संज्ञा जन (मनुष्य) के कारण ही प्राप्त करती है।

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- जिस प्रकार माता हमें जन्म देती है। पालन पोषण करती है, हमें प्यार करती है, उसी प्रकार पृथ्वी हमें अन्न देती है इसकी धूल में हम खेल कर बड़े होते हैं, इसकी हवा में हम सांस लेते हैं। पृथ्वी एक माता के ही समान हमारा पालन पोषण करती है। अतः पृथ्वी एक माता के समान है और मनुष्य सच्चे अर्थों में पृथ्वी का पुत्र है। ‌

(v) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर- इस गद्यांश का शीर्षक राष्ट्र का स्वरूप है तथा इसके लेखक वासुदेव शरण अग्रवाल है।

 

गद्यांश-8

निन्दा कुछ लोगों की पूँजी होती है। बड़ा लम्बा-चौड़ा व्यापार फैलाते हैं वे उसी पूँजी से। कई लोगों की प्रतिष्ठा ही दूसरों की कलंक कथाओं के पारायण पर आधारित होती है। बड़े रस-विभोर होकर वे जिस तिस की सत्य कल्पित कलंक कथा सुनाते हैं और स्वयं को पूर्ण संत समझने की तुष्टि का अनुभव करते हैं।

(i) निन्दा किसकी पूँजी होती है?

उत्तर-  निंदा कुछ लोगों की पूंजी होती है।

(ii) कुछ लोगों की प्रतिष्ठा का आधार क्या होता है?

उत्तर- कुछ लोगों की प्रतिष्ठा का आधार इसलिए प्राप्त होता है कि वह दूसरों की निंदा करने में कुशल होते हैं। 

(iii) ‘सत्य-कल्पित कलंक-कथा’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए

उत्तर-  ‘सत्य-कल्पित कलंक-कथा’ का अर्थ ‘सत्य काल्पनिक कलंक पूर्ण घटना’ है

(iv) रेखांकित अंश का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- लेखक का मानना है कि कुछ लोग निंदा को इस प्रकार महत्व देते हैं। जैसे व्यापारी अपनी पूंजी को देता है। वह निंदा को पूंजी समझते हुए ही अपना व्यापार बढ़ाने में लगे रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अधिक से अधिक सर्वत्र निंदा करना ही उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य होता है। उनकी यह धारणा होती है कि वह जितना अधिक निंदा करेंगे उतना ही लाभ उनको प्राप्त होगा।

(v) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर-: इस गद्यांश के पाठ का शीर्षक निंदा रस और इसके लेखक हरिशंकर परसाई हैं।

 

गद्यांश-9

मुझे मानव जाति की दुर्दम-निर्मम धारा के हजारों वर्ष का रूप साफ दिखाई दे रहा है। मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। न जाने कितने धर्माचारों, विश्वासों, उत्सवों और व्रतों को धोती-बहाती यह जीवन-धारा आगे बढ़ी है।  संघर्षों से मनुष्य ने नई शक्ति पाई है

(i) लेखक को क्या स्पष्ट दिखाई दे रहा है?

उत्तर- लेखक को मनुष्य की दुर्गम-निर्मम(क्रूर) विचारधारा स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है

(ii) मनुष्य ने नई शक्ति किससे पाई है?

उत्तर- मनुष्य ने संघर्ष से नवीन शक्ति को प्राप्त किया है।

(iii) ‘धर्माचारों’ और ‘विश्वासों’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-  धर्मचारों का अर्थ ‘धार्मिक परंपरा’ तथा ‘विश्वासों’ का अर्थ निश्चित धारणा। 

(iv) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर- इस संसार में व्यक्ति को यदि सबसे प्रिय कोई वस्तु है तो वह उसके प्राण है। अपने प्राणों को सुरक्षित बनाए रखने की लालसा के कारण ही वह संसार चल रहा है। व्यक्ति सदैव अपने प्राणों की रक्षा के लिए प्रयत्नशील रहता है। इसकी रक्षा के लिए वह कितना भी क्रूर, निर्म, पापपूर्ण, घृणित कार्य कर सकता है। उसका अपने प्राणों के प्रति यही मोह उसकी सबसे बड़ी शक्ति है, जिसे जीवन शक्ति कहा जाता है।

(v) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर- इस गद्यांश का पाठ का शीर्षक अशोक के फूल तथा इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी है।

 

गद्यांश-10

यदि यह नवीनीकरण सिर्फ कुछ पण्डितों की व आचायों की दिमागी कसरत ही बनी रहे तो भाषा गतिशील नहीं होती। भाषा का सीधा सम्बन्ध प्रयोग से है और जनता से है। यदि नए शब्द अपने उद्गम स्थान में ही अड़े रहें और कहीं भी उनका प्रयोग किया नहीं जाए तो उसके पीछे के उद्देश्य पर ही कुठाराघात होगा।

(i) भाषा का सीधा सम्बन्ध किससे है?

उत्तर- भाषा का सीधा संबंध प्रयोग और जनता से, जो भाषा जनता द्वारा जितनी अधिक स्वीकृत एवं परिवर्तित की जाती है। वह भाषा उतनी ही अधिक जीवंत तथा चिरस्थाई होती है।

(ii) नए शब्दों के प्रयोग न किए जाने पर क्या परिणाम होगा?

उत्तर – नए शब्दों के प्रयोग न किए जाने का परिणाम यह होगा की भाषा के उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो पाएंगे। भाषा का उद्देश्य समाज के भाव की अभिव्यक्ति को सरल बनाकर भाव एवं विचारों को सरलता से एक दूसरे तक पहुंचाना। अतः भाषा को संजीव बनाने के लिए नवीनता का समावेश होना आवश्यक है।

(iii) ‘कुठाराघात’ का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –  ‘कुठाराघात’ का आशय है बहुत हानि पहुंचाने वाला कार्य। 

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – 

(v) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर – इस गद्यांश का शीर्षक भाषा और आधुनिकता है तथा इसके लेखक प्रो.जी. सुंदर रेडी है।

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गद्यांश-11

रमणीयता और नित्य नूतनता अन्योन्याश्रित है, रमणीयता के अभाव में कोई भी चोज मान्य नहीं होती। नित्य नूतनता किसी भी सर्जक की मौलिक उपलब्धि की प्रामाणिकता सूचित करती है। उसकी अनुपस्थिति में कोई भी चीज वस्तुतः जनता व समाज के द्वारा स्वीकार्य नहीं होती। सड़ी-गली मान्यताओं से जकड़ा हुआ समाज जैसे आगे बढ़ नहीं पाता, वैसे ही पुरानी रीतियों और शैलियों की परम्परागत लीक पर चलनेवाली भाषा भी जन-चेतना को गति देने में प्रायः असमर्थ ही रह जाती है। भाषा समूची युग-चेतना की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है और ऐसी सशक्त तभी वह अर्जित कर सकती है जब वह अपने युगानुकल सही मुहावरों को ग्रहण कर सके। भाषा सामाजिक भाव-प्रकटीकरण की सुबोधता के लिए ही उद्दिष्ट है, उसके अतिरिक्त उसकी जरूरत ही सोची नहीं जाती।

(i) सर्जक की मौलिक उपलब्धि का प्रमाण क्या है?

उत्तर – 

(ii) किससे जकड़ा हुआ समाज आगे बढ़ नहीं पाता?

उत्तर – 

(iii) ‘रमणीयता’ और ‘उद्दिष्ट’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – 

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – 

(v) उपर्युक्त गाद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर – 

 

गद्यांश-12

जो कुछ भी हम इस संसार में देखते हैं वह ऊर्जा का ही स्वरूप है। जैसा कि महर्षि अरविन्द ने कहा है कि हम भी ऊर्जा के ही अंश हैं। इसलिए जब हमने यह जान लिया है कि आत्मा और पदार्थ दोनों ही अस्तित्व का हिस्सा हैं, वे एक-दूसरे से पूरा तादात्म्य रखे हुए हैं तो हमे यह एहसास भी होगा कि भौतिक पदाथों की इच्छा रखना किसी भी दृष्टिकोण से शर्मनाक या गैर-आध्यात्मिक बात नहीं है।

(i) महर्षि अरविन्द ने क्या कहा है?

उत्तर – 

(ii) हम इस संसार में जो कुछ देखते हैं वह क्या है?

उत्तर –

(iii) ‘अस्तित्व’ और ‘तादात्म्य’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

(v) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

गद्यांश-13

माता अपने सब पुत्रों को समान भाव से चाहती है। इसी प्रकार पृथ्वी पर बसनेवाले जन बराबर हैं। उनमें ऊँच और नीच का भाव नहीं है। जो मातृभूमि के उदय के साथ जुड़ा हुआ है वह समान अधिकार का भागी है। पृथिवी पर निवास करने वाले जनों का विस्तार अनन्त है- नगर और जनपद, पुर और गाँव, जंगल और पर्वत नाना प्रकार के जनों से भरे हुए हैं। ये जन अनेक प्रकार की भाषाएँ बोलनेवाले और अनेक धर्मों के माननेवाले हैं, फिर भी ये मातृभूमि के पुत्र हैं और इस कारण उनका सौहार्द भाव अखण्ड है। सभ्यता और रहन-सहन की दृष्टि से जन एक-दूसरे से आगे-पीछे हो सकते हैं, किन्तु इस कारण से मातृभूमि के साथ उनका जो सम्बन्ध है उसमें कोई भेदभाव उत्पन्न नहीं हो सकता। पृथिवी के विशाल प्रांगण में सब जातियों के लिए समान क्षेत्र है। समन्वय के मार्ग से भरपूर प्रगति और उन्नति करने का सबको एक जैसा अधिकार है। किसी जन को पीछे छोड़कर राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता। अतएव राष्ट्र के प्रत्येक अंग की सुध हमें लेनी होगी।

(i) माता अपने सब पुत्रों को किस भाव से चाहती है? 

उत्तर – 

(ii) राष्ट्र के प्रत्येक अंग की सुध हमें क्यों लेनी होगी?

उत्तर – 

(iii) ‘सौहार्द’ और ‘प्रांगण’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

(v) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर – 

 

गद्यांश-14

ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा भी होती है, लेकिन इसमें वह मजा नहीं जो मिशनरी भाव से निन्दा करनें में आता है। इस प्रकार का निन्दक बड़ा दुःखी होता है। ईर्ष्या-द्वेष से चौबीसों घण्टे जलता रहता है और निन्दा का जल छिड़ककर कुछ शान्ति अनुभव करता है। ऐसा निन्दक बड़ा दयनीय होता है। अपनी अक्षमता से पीड़ित वह बेचारा दूसरे की सक्षमता के चाँद को देखकर सारी रात श्वान जैसा भौंकता है। ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा करने वालों को कोई दण्ड देने की जरूरत नहीं है। वह बेचारा स्वयं दण्डित होता है। आप चैन से सोइए और वह जलन के कारण सो नहीं पाता। उसे और क्या दण्ड चाहिए? निरन्तर अच्छे काम करते जाने से उसका दण्ड भी सख्त होता जाता है। जैसे एक कवि ने एक अच्छी कविता लिखी, ईर्ष्याग्रस्त निन्दक को कष्ट होगा। अब अगर एक और अच्छी लिख दी तो उसका कष्ट दोगुना हो जाएगा।

(i) मिशनरी भाव से निन्दा करने में क्या मिलता है?

उत्तर – 

(ii) ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दक किस कारण सो नहीं पाता?

उत्तर –

(iii) ‘अक्षमता’ और ‘निरन्तर’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

(v) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर –

गद्यांश-15

जन का प्रवाह अनंत होता है। सहस्रों वर्षों से भूमि के साथ राष्ट्रीय जन ने तादात्म्य प्राप्त किया है। जब तक सूर्य की रश्मियाँ नित्य प्रातःकाल भुवन को अमृत से भर देती हैं तब तक राष्ट्रीय जन का जीवन भी अमर है। इतिहास के अनेक उतार-चढ़ाव पार करने के बाद भी राष्ट्र निवासी जन नई उठती लहरों से आगे बढ़ने के लिए अजर-अमर हैं। जन का संततवाही जीवन नदी के प्रवाह की तरह है, जिसमें कर्म और श्रम के द्वारा उत्थान के अनेक घाटों का निर्माण करना होता है।

(i) ‘जन का प्रवाह’ से क्या तात्पर्य है?

(ii) राष्ट्र निवासी जन किसके समान आगे बढ़ने के लिए अजम-अमर हैं?

(iii) उत्थान के घाटों का निर्माण कैसे होगा?

(iv) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।

(v) पाठ का शीर्षक और उसके लेखक का नाम बताइए।

 

गद्यांश-16

मगर उदास होना बेकार है। अशोक आज भी उसी मौज में है, जिसमें आज से दो हजार वर्ष पहले था। कहीं भी तो कुछ नहीं बिगड़ा है, कुछ भी तो नहीं बदला, है। बदली है मनुष्य की मनोवृत्ति। यदि बदले बिना वह आगे बढ़ सकती तो शायद वह भी नहीं बदलती। और यदि वह न बदलती और व्यावसायिक संघर्ष आरम्भ हो जाता- मशीन का रथ घर्घर चल पड़ता विज्ञान का सावेग धावन चल निकलता तो बड़ा बुरा होता है।

(i) लेखक के अनुसार किसमें परिवर्तन हुआ है?

(ii) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।

(iii) ‘मनोवृत्ति’ और ‘घावन’ शब्दों का आशय लिखिए।

(iv) अशोक आज भी उसी मौज में क्यों है?

(v) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और उसके लेखक का नाम लिखिए।

 

गद्यांश-17

निन्दा का उद्गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निन्दा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है। उसके अहं की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बड़ी बनती है। ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। कठिन कर्म ही ईर्ष्या द्वेष और उनसे उत्पन्न निन्दा को मारता है। इन्द्र बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है, क्योंकि वह निठल्ला है। स्वर्ग में देवताओं को बिना उगाया अन्न बे बनाया महल और बिन बोए फल मिलते हैं।

(i) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ii) निन्दा का उद्गम कहाँ से होता है?

(iii) ईर्ष्या-द्वेष और निन्दा को मारने के लिए क्या आवश्यक है?

(iv) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

(v) स्वर्ण में देवताओं को बिना श्रम क्या प्राप्त हो जाता है?

 

गद्यांश-18

बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबंध मात्र है। संस्कृति ही जन का मष्तिष्क है। सस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित कर दिए जाए, तो राष्ट्र का लोप समझना चाहिए। जीवन के विटप का पुष्प संस्कृति है। संस्कृति के सौन्दर्य और सौरभ में ही राष्ट्रीय जन के जीवन का सौन्दर्य और यश अन्तर्निहित है।

(i) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ii) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए

(iii) राष्ट्र की वृद्धि कैसे सम्भव है?

(iv) किसी राष्ट्र का लोप कब हो जाता है?

(v) भूमि और जन के अतिरिक्त राष्ट्र में और क्या महत्त्वपूर्ण है?

 

गद्यांश-19

साहित्य, कला, नृत्य, गीत, अमोद-प्रमोद अनेक रूपों में राष्ट्रीय जन अपने-अपने मानसिक भावों को प्रकट करते हैं। आत्मा का जो विश्वव्यापी आनन्द-भाव है वह इन विविध रूपों में साकार होता है। यद्यपि बाह्य रूप की दृष्टि से संस्कृति के ये बाहरी लक्षण अनेक दिखायी पड़ते हैं, किन्तु आन्तरिक आनन्द की दृष्टि से उनमें एक सूत्रता है। जो व्यक्ति सहृदय है, वह प्रत्येक संस्कृति के आनन्द पक्ष को स्वीकार करता है और उससे आनंदित होता है।

(i) राष्ट्रीय जन अपने मनोभावों को किन रूपों में प्रकट करते हैं? 

(ii) प्रत्येक संस्कृति के आनन्द पक्ष को कौन स्वीकार करता है?

(iii) ‘विश्वव्यापी’ और ‘आन्तरिक आनन्द’ का क्या अर्थ है?

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(v) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

 

गद्यांश-20

भाषा स्वयं संस्कृति का एक अटूट अंग है। संस्कृति परम्परा से निःसृत होने पर भी परिवर्तनशील और गतिशील है। उसकी गति विज्ञान की प्रगति के साथ जोड़ी जाती है। वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रभाव के कारण उदभूत नई सांस्कृतिक हलचलों को शाब्दिक रूप देने के लिए भाषा के परम्परागत प्रयोग पर्याप्त नहीं है। इसके लिए नये प्रयोगों की, नई भाव-योजनाओं को व्यक्त करने के लिए नये शब्दों की खोज की महती आवश्यकता है।

(i) संस्कृतिक की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

(ii) नए शब्दों की खोज की आवश्यकता क्यों होती है?

(iii) ‘उद्भूत’ और ‘परम्परागत’ का अर्थ लिखिए।

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(v) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

 

गद्यांश-21

माता अपने सब पुत्रों को समान भाव से चाहती है। इसी प्रकार पृथिवी पर बसने वाले जन बराबर है। उनमें ऊँच और नीच का भाव नहीं है। जो मातृभूमि के उदय के साथ जुड़ा हुआ है, वह समान अधिकार का भागी है। पृथिवी पर निवास करने वाले जनों का विस्तार अनन्त है- नगर और जनपद, पुर और गाँव, जंगल और पर्वत नाना प्रकार के जनों से भरे हुए हैं। ये जन अनेक प्रकार की भाषाएँ बोलने वाले और अनेक धर्मों को मानने वाले हैं, फिर भी ये मातृभूमि के पुत्र हैं।

(क) पुत्र को समान भाव से कौन रखती है?

(ख) समान अधिकार का भागी कौन है?

(ग) पृथ्वी पर किसका विस्तार अनन्त है?

(घ) ‘अनन्त’ और ‘जनपद’ शब्द का अर्थ लिखिए।

(ङ) पाठ का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए।

 

गद्यांश-22

रवीन्द्रनाथ ने इस भारतवर्ष को महामानव समुद्र कहा है। विचित्र देश है वह! असुर आये, आर्य आये, शक आये, हुण आये, नाग आये, यक्ष आये, गन्धर्व आये, न जाने कितनी मानव जातियाँ यहाँ आयी और आज के भारतवर्ष को बनाने में अपना हाथ लगा गयी। जिसे हम हिन्दू रीति नीति कहते हैं। ‘वे अनेक आर्य और आर्येतर उपादानों का अदभूत मिश्रण है’।

(क) पाठ का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए।

(ख) रवीन्द्रनाथ ने किसे महामानव समुद्र कहा है?

(ग) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(घ) भारतवर्ष के निर्माण में किन-किन का सहयोग रहा है?

(ङ) आर्य, शक, हुण कहाँ आए?

 

गद्यांश-23

जन का प्रवाह अनन्त होता है। सहस्रों वर्षों से भूमि के साथ राष्ट्रीय जन ने तादात्म्य प्राप्त किया है। जब तक सूर्य की रश्मियाँ नित्य प्रातःकाल भुवन को अमृत से भर देती हैं तब तक राष्ट्रीय जन का जीवन भी अमर है। इतिहास के अनेक उतार-चढ़ाव पार करने के बाद भी राष्ट्र-निवासी जन नई उठती लहरों से आगे बढ़ने के लिए अजर-अमर है। जन का संततवाही जीवन नदी के प्रवाह की तरह है, जिसमें कर्म और श्रम के द्वारा उत्थान के अनेक घाटों का निर्माण करना होता है।

(i) राष्ट्रीय जन ने किसके साथ तादात्म्य प्राप्त किया है?

(ii) राष्ट्रीय जन का जीवन भी कब तक अमर है?

(iii) जन का संततवाही जीवन किस तरह है?

(iv) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।

(v) दिए गए गद्यांश का शीर्षक एवं लेखक का नामोल्लेख कीजिए।

गद्यांश-24

‘क’ कई महीने बाद आए थे। सुबह चाय पीकर अखबार देख रहा था कि वे तूफान की तरह कमरे में घुसे, ‘साइक्लोन’ की तरह मुझे अपनी भुजाओं में जकड़ा तो मुझे धृतराष्ट्र की भुजाओं में जकड़े भीम के पुतले की याद आ गयी। यह धृतराष्ट्र की ही जकड़ थी। अंधे धृतराष्ट्र ने टटोलते हुए पूछा, “कहाँ है भीम? आ बेटा, तुझे कलेजे से लगा लूँ।” और जब भीम का पुतला उनकी पकड़ में आ गया तो उन्होंने प्राणाघाती स्नेह से उसे जकड़ कर चूर कर डाला।

(i) ‘क’ किस तरह कमरे में घुसे और उन्होंने किस तरह मुझे भुजाओं में जकड़ा?

(ii) मुझे किसके पुतले की याद आ गई?

(iii) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।

(iv) धृतराष्ट्र ने भीम के पुतले के साथ क्या किया?

(v) दिए गए गद्यांश के पाठ का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए।

 

गद्यांश-25

जन का प्रवाह अनन्त होता है। सहस्रों वर्षों से भूमि के साथ राष्ट्रीय जन ने तादात्म्य प्राप्त किया है। जब तक सूर्य की रश्मियाँ नित्य प्रातःकाल भुवन को अमृत से भर देती हैं, तब तक राष्ट्रीय जन का जीवन भी अमर है। इतिहास के अनेक उतार-चढ़ाव पार करने के बाद भी राष्ट्र निवासी जन नई उठती लहरों से आगे बढ़ने के लिए अजर-अमर हैं। जन का संततवाही जीवन नदी के प्रवाह की तरह है, जिसमें कर्म और श्रम के द्वारा उत्थान के अनेक घाटों का निर्माण करना होता है।

(क) पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

(ख) जन का प्रवाह का आशय लिखिए।

(ग) भूमि के साथ किसने तादात्म्य प्राप्त किया है?

(घ) जन का जीवन किस तरह है?

(ङ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

 

गद्यांश-26

भाषा स्वयं संस्कृति का एक अटूट अंग है। संस्कृति परम्परा से निःसृत होने पर भी परिवर्तनशील और गतिशील है। उसकी गति विज्ञान की प्रगति के साथ जोड़ी जाती है। वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रभाव के कारण उद्भूत नई सांस्कृतिक हलचलों को शाब्दिक रूप देने के लिए भाषा के परम्परागत प्रयोग पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए नए प्रयोगों की नई भाव योजनाओं को व्यक्त करने के लिए नए शब्दों की खोज की महती आवश्यकता है।

(क) पाठ का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए।

(ख) भाषा किसका अटूट अंग है?

(ग) किसकी गति विज्ञान की प्रगति के साथ जोड़ी जाती है?

(घ) सांस्कृतिक हलचलें किसके लिए पर्याप्त नहीं हैं?

(ङ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

 

गद्यांश-27

मैं यह नहीं मानता की समृद्धि और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी है या भौतिक वस्तुओं की इच्छा रखना कोई गलत सोच है। उदाहरण के तौर पर मैं खुद न्यूनतम वस्तुओं का भोग करते हुए जीवन बिता रहा हूं, लेकिन मैं सर्वत्र समृद्धि की कद्र करता हूं, क्योंकि यह अपने साथ सुरक्षा तथा विश्वास लाती हैं, जो अंततः हमारी आजादी को बनाए रखने में सहायक है। आप आसपास देखेंगे तो पाएंगे कि खुद प्रकृति भी कोई काम आधे अधूरे मन से नहीं करती। किसी बगीचे में जाइए, मौसम में तरक्की फूलों की बहार देखने को मिलेगी अथवा ऊपर की तरफ ही देखे या ब्रह्मांड आपको अनंत तक फैला दिखाई देगा, आपकी यकीन से भी परे।

(क) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।

(ख) रेखांकित गद्यांश का आशय स्पष्ट करें।

(ग) भौतिक समृद्धि के महत्त्व के विषय में लेखक की क्या मान्यता है?

(घ) लेखक के अनुसार मनुष्य को जीवन में भौतिक एवं आध्यात्मिक वस्तुओं को किस प्रकार स्वीकार करना चाहिए?

(ङ) भौतिक समृद्धि अपने साथ क्या लाती है?

 

गद्यांश-28

धरती माता की कोख में जो अमूल्य निधियाँ भरी हैं जिनके कारण वह वसुन्धरा कहलाती है, उससे कौन परिचित न होना चाहेगा? लाखों-करोड़ों वर्षों से अनेक प्रकार की धातुओं को पृथ्वी के गर्भ में पोषण मिला है। दिन-रात बहने वाली नदियों ने पहाड़ों को पीस-पीस कर अगणित प्रकार की मिट्टियों से पृथ्वी की देह को सजाया है। हमारे भावी आर्थिक अभ्युदय के लिए इन सबकी जाँच-पड़ताल अत्यन्त आवश्यक है।

(क) पृथ्वी को वसुन्धरा क्यों कहा जाता है?

(ख) पृथ्वी की देह को किसने संवारा है?

(ग) हमारे आर्थिक अभ्युदय के लिए क्या आवश्यक है?

(घ) पाठ का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए।

(ङ) पहाड़ों को किसने पीसा है?

 

गद्यांश-29

 

जन का प्रवाह अनन्त होता है। सहस्रों वर्षों से भूमि के साथ राष्ट्रीय जन ने तादात्म्य प्राप्त किया है। जब तक सूर्य की रश्मियाँ नित्य प्रातःकाल भुवन को अमृत से भर देती हैं, तब तक राष्ट्रीय जन का जीवन भी अमर है। इतिहास के अनेक उतार-चढ़ाव पार करने के बाद भी राष्ट्र निवासी जन नई उठती लहरों से आगे बढ़ने के लिए अजर-अमर है। जन का सततवाही जीवन नदी के प्रवाह की तरह है, जिसमें कर्म और श्रम के द्वारा उत्थान के अनेक घाटों का निर्माण करना होता है।

(क) ‘जन का प्रवाह’ का आशय लिखिए।

(ख) राष्ट्रनिवासी जन किसके समान आगे बढ़ने के लिए अजर-अमर हैं?

(ग) उत्थान के घाटों का निर्माण कैसे होगा?

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ङ) पाठ का शीर्षक और उसके लेखक का नाम लिखिए।

 

गद्यांश-30

मगर उदास होना बेकार है। अशोक आज भी उसी मौज में है, जिसमें आज से दो हजार वर्ष पहले था। कहीं भी तो कुछ नहीं बिगड़ा है, कुछ भी तो नही बदला है। बदली है मनुष्य की मनोवृत्ति। यदि बदले बिना वह आगे बढ़ सकती तो शायद वह भी नहीं बदलती और यदि वह न बदलती, और व्यावसायिक संघर्ष आरम्भ हो जाता-मशीन का रथ घर्घर चल पड़ता। विज्ञान का सावेग घावन चल निकलता तो बड़ा बुरा होता।

(क) लेखक के अनुसार किसमें परिवर्तन हुआ है?

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ग) मनोवृत्ति और घावन शब्दों का आशय लिखिए।

(घ) अशोक आज भी उसी मौज में क्यों है?

(ङ) उपरोक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और उसके लेखक का नाम लिखिए।

UP Board Class 12 Previous Year Samanya Hindi Question Paper 

गद्यांश-31

राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है। मनुष्यों ने युग-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबंध मात्र है। संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है। संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

(क) राष्ट्र की वृद्धि कैसे सम्भव है?

(ख) संस्कृति जन का मस्तिष्क किस प्रकार है?

(ग) ‘जन की संस्कृति’ से आप क्या समझते हैं?

(घ) ‘विकास’ और ‘अभ्युदय’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

(ङ) दिए गए गद्यांश का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए।

 

गद्यांश-32

भाषा की साधारण इकाई शब्द है। शब्द के अभाव में भाषा का अस्तित्व ही दुरूह है। यदि भाषा में विकसनशीलता शुरू होती है, तो शब्दों के स्तर पर ही। दैनन्दिन सामाजिक व्यवहारों में हम कई ऐसे नवीन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जो अंग्रेजी, अरबी, फारसी आदि विदेशी भाषाओं से उधार लिए गए हैं। वैसे ही नए शब्दों का गठन भी अनजाने में अनायास ही होता है।

(क) किसके अभाव में भाषा का अस्तित्व ही दुरूह है?

(ख) नए शब्दों का गठन कैसे होता है?

(ग) किन विदेशी भाषाओं से शब्द लेकर हम नए शब्दों का इस्तेमाल करते हैं?

(घ) भाषा की साधारण इकाई क्या है?

(ङ) गद्यांश का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए।

 

गद्यांश-33

भूमि का निर्माण देवों ने किया है। वह अनन्त काल से है। उसके भौतिक रूप, सौन्दर्य और समृद्धि के प्रति सचेत होना हमारा आवश्यक कर्त्तव्य है। भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितने अधिक जागरित होंगे, उतनी ही हमारी राष्ट्रीयता बलवती हो सकेगी। यह पृथिवी सच्चे अर्थों में समस्त राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी है।

जो राष्ट्रीयता पृथिवी के साथ नहीं जुड़ी वह निर्मूल होती है। राष्ट्रीयता की जड़ें पृथिवी में जितनी गहरी होंगी उतना ही राष्ट्रीय भावों का अंकुर पल्लवित होगा। इसलिए पृथिवी के भौतिक स्वरूप की आद्योपांत जानकारी प्राप्त करना, उसकी सुन्दरता, उपयोगिता और महिमा को पहचानना आवश्यक धर्म है।

(क) भूमि का निर्माण किसने किया है और वह कब से है?

(ख) यह पृथ्वी सच्चे अर्थों में किसकी जननी है?

(ग) ‘पार्थिव’ और ‘आद्योपान्त’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ङ) उपरोक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

 

गद्यांश-34

भगवान् बुद्ध ने मार-विजय के बाद वैरागियों की पलटन खड़ी की थी। असल में ‘मार’ मदन का भी नामांतर है। कैसा मधुर और मोहक साहित्य उन्होंने दिया। पर न जाने कब यक्षों के वज्रपाणि नामक देवता इस वैराग्यप्रवण धर्म में घुसे और बोधिसत्वों के शिरोमणि बन गए फिर वज्रयान का अपूर्व धर्म-मार्ग प्रचलित हुआ।

त्रिरत्नों में मदन देवता ने आसन पाया। वह एक अजीब आँधी थी। इसमें बौद्ध बह गए, शैव बह गए, शाक्त बह गए। उन दिनों ‘श्रीसुन्दरीसाधनतत्पराणां योगश्च भोगश्च करस्थ एव’ की महिमा प्रतिष्ठित हुई। काव्य और शिल्प के मोहक अशोक ने अभिचार में सहायता दी।

(क) भगवान् बुद्ध ने मार विजय के बाद क्या किया?

(ख) बोधिसत्वों का शिरोमणि कौन बन गया?

(ग) ‘बोधिसत्व’ और ‘अभिसार’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और लेखक का नाम लिखिए।

 

गद्यांश-35

साहित्य, कला, नृत्य, गीत, आमोद-प्रमोद अनेक रूपों में राष्ट्रीय जन अपने-अपने मानकिस भवों को प्रकट करते हैं। आत्मा का जो विश्वव्यापी आनन्द-भाव है, वह इन विविध रूपों में साकार होता है।

यद्यपि बाह्य रूप की दृष्टि से संस्कृति के ये बाहरी लक्षण अनेक दिखाई पड़ते हैं, किन्तु आन्तरिक आनन्द की दृष्टि से उनमें एकसूत्रता है। जो व्यक्ति सहृदय है, वह प्रत्येक संस्कृति के आनन्द-पक्ष को स्वीकार करता है और उससे आनन्दित होता है। इस प्रकार की उदार भावना ही विविध जनों से बने हुए राष्ट्र के लिए स्वास्थ्यकर है।

(क) राष्ट्रीय जन अपने-अपने मानसिक भावों को किन रूपों में प्रकट करते हैं?

(ख) संस्कृति के आनन्द पक्ष को कौन स्वीकार करता है? 

(ग) ‘मानसिक’ और ‘स्वास्थ्यकर’ शब्दों के अर्थ लिखिए।

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और उसके लेखक का नाम लिखिए।

 

गद्यांश-36

रमणीयता और नित्य नूतनता अन्योन्याश्रित है, रमणीयता के प्रभाव में कोई भी चीज मान्य नहीं होती। नित्य नूतनता किसी भी सर्जक की मौलिक उपलब्धि की प्रामाणिकता सूचित करती है और उसकी अनुपस्थिति में कोई भी चीज वस्तुतः जनता व समाज के द्वारा स्वीकार्य नहीं होती।

सड़ी-गली मान्यताओं से जकड़ा हुआ जैसे आगे बढ़ नहीं पाता, वैसे ही पुरानी रीतियों और शैलियों की परम्परागत लीक पर चलने वाली भाषा भी जन-चेतना को गति देने में प्रायः असमर्थ ही रह जाती है।भाषा समूची युग चेतना की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है।

(क) नित्य नूतनता क्या सूचित करती है?

(ख) युग-चेतना की सशक्त अभिव्यक्ति का साधन क्या है?

(ग) ‘अन्योन्याश्रित’ और ‘परम्परागत’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का शीर्षक और उसके लेखक का नाम लिखिए।

 

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