Construction and features of the Indian Constitution in Hindi – भारतीय संविधान का निर्माण एवं विशेषताएं

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Construction and features of the Indian Constitution in Hindi – भारतीय संविधान का निर्माण एवं विशेषताएं 

इस पोस्ट में Bhartiya sanvidhan ka Nirman aur visheshtaen के बारे में इस पोस्ट में सम्पूर्ण जानकारी दी गई है।

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Construction and features of the Indian Constitution in Hindi - भारतीय संविधान का निर्माण एवं विशेषताएं 
Construction and features of the Indian Constitution in Hindi – भारतीय संविधान का निर्माण एवं विशेषताएं

 

इस पोस्ट में निम्न टापिक्स को Cover किया गया है –

  • संविधान का अर्थ एवं परिभाषा 
  • संविधान का महत्व 
  • भारतीय संविधान के निर्माण की पृष्ठभूमि 
  • संविधान का निर्मात्री सभा 
  • संविधान सभा द्वारा समितियो का गठन 
  • प्रारूप समिति 
  • भारतीय संविधान के प्रमुख स्रोत 
  • संविधान की प्रस्तावना 
  • भारतीय संविधान की विशेषताएं 
  • भारतीय संविधान का स्वरूप 
  • भारतीय संविधान के संघात्मक लक्षण (विशेषताएं)
  • भारतीय संविधान की एकात्मक लक्षण (विशेषताएं)

संविधान का अर्थ एवं परिभाषा 

“संविधान उन आधारभूत नियमों व कानून का संग्रह है, जिनके आधार पर किसी देश का शासन चलाया जाता है।”

ब्राइस के अनुसार – “संविधान ऐसे निश्चित नियमों का संग्रह होता है, जिसे सरकार की कार्य विधि प्रतिपादित होती है और जिनके द्वारा उनका संचालन होता है।”

फाइनर के अनुसार – “संविधान आधारभूत राजनीतिक संस्थाओं की व्यवस्था होती है।”

संविधान का महत्व 

  • शासन तंत्र समुचित ढंग से चला रहे इसके लिए संविधान का होना नितांत आवश्यक है। 
  • संविधान देश की सरकार को नियंत्रित करता है, जिससे वह सुरक्षाचारी या निरंकुश न बन सके।
  • संविधान देश के नागरिकों के भौतिक अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं की रक्षा भी करता है। 

भारतीय संविधान के निर्माण के पृष्ठभूमि 

सन 1924 में पंडित मोतीलाल नेहरू ने स्पष्ट शब्दों में कहा था- 

“भारत का संविधान बनाने के लिए भारतीय संविधान सभा का निर्माण किया जाना चाहिए।”

1938 ई. में पंडित जवाहरलाल नेहरू का विचार था- 

“स्वतंत्र भारत का संविधान बिना किसी बाह्य हस्तक्षेप के वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित सभा द्वारा बनाया जाए।”

1939 ई. के कांग्रेस अधिवेशन में इस मांग को दोहराते हुए इस आशय का प्रस्ताव पारित किया गया कि एक स्वतंत्र देश के संविधान निर्माण का एकमात्र तरीका संविधान सभा होगी। 

अंग्रेजी सरकार ने भारतीयों की सी मांग को अस्वीकार कर दिया। 

नोट- 1946 की मंत्रिमंडल मिशन योजना में अंग्रेजों ने भारतीय संविधान सभा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

संविधान निर्मात्री सभा 

मंत्रिमंडल (कैबिनेट) मिशन योजना के आधार पर जुलाई 1946 ई. में संविधान सभा के चुनाव हुए।

संविधान सभा की कुल 389 स्थान में से प्रान्तो के लिए 296 स्थानों के लिए चुनाव हुए।

इसमें से 211 स्थान कांग्रेस को, 73 स्थान मुस्लिम लीग, 4 स्थान अन्य दलों को तथा 8 स्थान स्वतंत्र उम्मीदवारों को प्राप्त हुए।

93 स्थान भारतीय रियासतों के लिए थे किंतु वह पूरे भर ना जा सके।

संविधान सभा में महात्मा गांधी व जिन्ना को छोड़कर सभी प्रमुख नेता शामिल थे। 

मुख्य नेताओं में पंडित नेहरू, डॉ राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, श्रीमती सरोजिनी नायडू, श्रीमती दुर्गाबाई देशमुख, श्रीमती हंसा मेहता और श्रीमती रेणुका राय प्रमुख थी।

संविधान सभा की प्रमुख समितियां एवं उनके अध्यक्ष 

संचालन समिति डॉ राजेंद्र प्रसाद
प्रांतीय संविधान समिति सरदार वल्लभभाई पटेल
झंडा समिति जे.बी. कृपलानी
संघ संविधान समिति पंडित जवाहरलाल नेहरू
प्रारूप समिति डॉ भीमराव अंबेडकर
संघ शक्ति समिति पंडित जवाहरलाल नेहरू

प्रारूप समिति 

संविधान को अंतिम रूप देने के लिए संविधान सभा ने डॉ भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में सात सदस्यों की एक प्रारूप समिति नियुक्त की। 

प्रारूप समिति ने अपना प्रारूप 21 फरवरी 1948 को प्रस्तुत किया। 

यह 5 नवंबर 1948 को संविधान सभा के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत किया गया। 

अंत में 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने 395 अनुच्छेद व 8 अनुसूचियो वाले प्रारूप को पारित कर दिया। 

नोटसंविधान पारित होने में 63 लाख, 96 हजार और ₹ 729 में हूएं। और 2 वर्ष, 11 माह,  18 दिन का समय लगा 

भारतीय संविधान के प्रमुख स्रोत 

संविधान निर्मात्री सभा ने भारत के लिए जिस संविधान की रचना की वह एक ऐसा संविधान है जो विश्व के अनेक संविधानों के अनेक अच्छे गुणो का सम्मिश्रण है। 

1.ब्रिटेन का संविधान- 

“ब्रिटेन के संविधान से संसदीय शासन प्रणाली, कानून निर्माण प्रक्रिया, एकल नागरिकता तथा स्पीकर का पद ग्रहण किया गया है।”

2.अमेरिका का संविधान-

“अमेरिका के संविधान से सर्वोच्च न्यायालय, स्वतंत्र न्यायपालिका, उपराष्ट्रपति का पद आदि बातें ग्रहण की गई है।”

3.कनाडा तथा आयरलैंड का संविधान-

“कनाडा के संविधान से संघीय व्यवस्था तथा आयरलैंड के संविधान से नीति-निर्देशक तत्व अधिग्रहण किए गए हैं।”

4.ऑस्ट्रेलिया का संविधान-

“ऑस्ट्रेलिया के संविधान से प्रस्तावना की भाषा तथा समवर्ती सूची की व्यवस्था को ग्रहण किया गया है”

5.दक्षिणी अफ्रीका का संविधान-

“दक्षिणी अफ्रीका के संविधान से संशोधन की प्रक्रिया को ग्रहण किया गया है।”

6.सोवियत गणराज्य का संविधान-

“सोवियत गणराज्य के संविधान से मूल कर्तव्यों को ग्रहण किया गया है।”

7.भारत अधिनियम, 1935-

“भारतीय अधिनियम 1935 से संघ और राज्यों के बीच संवैधानिक संबंध राष्ट्रपति के संकटकालीन अधिकारों की धाराएं आदि बातों को ग्रहण किया गया है।”

8.जापान का संविधान-

“भारतीय संविधान के 21वें अनुच्छेद द्वारा की गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता संबंधी व्यवस्था की भाषा जापान के संविधान से मिलती है।”

9.जर्मनी का संविधान-

“राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों का स्रोत जर्मनी का संविधान है।”

संविधान की प्रस्तावना 

प्रस्तावना संविधान का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। इसके द्वारा संविधान का मूल उद्देश्य व लक्ष्य को स्पष्ट किया जाता है। 

भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना में 42वें संवैधानिक संशोधन 1976 ई. द्वारा कुछ शब्दों को जोड़ा गया और अब संविधान की प्रस्तावना इस प्रकार है-

“हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी- संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”

Note : प्रस्तावना कानूनी दृष्टि से संविधान का अंग नहीं होता है और इस न्यायालय के माध्यम से लागू नहीं किया जाता है। 

भारतीय संविधान की विशेषताएं 

भारतीय संविधान अपनी विशेषताओं के कारण विश्व का अनोखा संविधान है। इसमें अनेक उल्लेखनीय विशेषताएं हैं जिनमें से प्रमुख इस प्रकार है- 

1.विस्तृत तथा व्यापक प्रलेख-
  • यह विश्व के विशालतम संविधान में से एक है। 
  • आरंभ में इसमें 22 भाग 395 अनुच्छेद एवं आठ अनुसूचियां थी। विभिन्न संशोधन के फल स्वरुप उनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है।
  • इसकी विशालता के कारण सर आइवर जेनिंग्स ने इसे “विश्व का सबसे बड़ा और विस्तृत संविधान कहां है” 
  • संविधान के भागों और अनुच्छेदों में संशोधन मूल संख्याओं में कोई परिवर्तन न करते हुए किया गया है। 
  • अर्थात आज भी अंतिम अनुच्छेद 395 तथा भाग 22 ही है। 
  • लेकिन गाना की दृष्टि से अनुच्छेदों की संख्या 450, भाग 24, अनुसूचियां 12 एवं परिशिष्ट 4 है। 

2.संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य 
  • संविधान की प्रस्तावना में भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है।
  • संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न का तात्पर्य यह है कि भारत अपनी गृह एवं वैदिशिक नीति में पूर्णता स्वतंत्र है।
  • लोकतंत्र का अर्थ राज्य के स्रोत सत्ता जनता में निहित है। 
  • गणराज्य का आशय यह है कि हमारे देश का प्रधान वंशानुगत ना होकर एक निश्चित अवधि के लिए चुना हुआ राष्ट्रपति होगा। 

3.समाजवादी राज्य
  • 42वें संवैधानिक संशोधन 1976 ई. द्वारा प्रस्तावना में भारत को समाजवादी राज्य घोषित किया गया है। 
  • समाजवादी राज्य से अभिप्राय यह है कि समस्त देशवासियों को अपने विकास तथा उन्नति के समान अवसर प्राप्त होंगे। 
4.संघात्मक शासन 
  • भारतीय संविधान द्वारा देश में संघात्मक शासन की स्थापना की गई है, जिसके अनुसार यहां दो समान सत्ताएं  केंद्र और राज्य हैं।
  • इनके बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है, स्वतंत्र न्यायपालिका और संविधान को सर्वोच्चता प्रदान की गई है।

5.धर्मनिरपेक्ष (पंथनिरपेक्ष) राज्य की स्थापना 
  • संविधान नें धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की है।
  • धर्मनिरपेक्ष का आशय ऐसे राज्य से होता है, जहां राज्य का कोई धर्म नहीं होता। 
  • संविधान के अनुच्छेद 25 में कहा गया है- “सार्वजनिक व्यवस्था सदाचार व स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए सब नागरिकों की अंत:करण की स्वतंत्रता का तथा धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा।”

6.संसदीय शासन प्रणाली 
  • भारत में संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना की गई है। 
  • इस व्यवस्था में वास्तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिमंडल के पास होती है और वह संसद (लोकसभा) के प्रति उत्तरदाई है।

6.शक्तिशाली केंद्र 
  • भारतीय संविधान में भारतीय संघ को एकात्मक संघ बनाया है जिसमें केंद्र शक्तिशाली रहता है। 
  • संविधान ने समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र द्वारा बनाए गए कानून को प्राथमिकता प्रदान की है। 
  • आवश्यकता पड़ने पर केंद्रीय सरकार राज्यों में आपातकाल की घोषणा करके वहां की कार्यपालिका शक्ति अपने हाथ में ले सकती है।

7.मूल अधिकारो की व्यवस्था 

भारतीय संविधान ने नागरिकों के लिए निम्न मूल अधिकार की व्यवस्था की है-

  • समता का अधिकार (right of equality)
  • स्वतंत्रता का अधिकार (right of Liberty)
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार (right against exploitation)
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (right to religious freedom)
  • संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (cultural and educational right)
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार (right to constitutional remedies) 

नोट- 

संविधान द्वारा नागरिकों को सा मूल अधिकार प्रदान किए गए थे किंतु 44वें संविधानिक संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा संपत्ति के मूल अधिकार को समाप्त कर दिया गया। 

अब संपत्ति का अधिकार केवल कानूनी अधिकार रह गया।

9.स्वतंत्र न्यायपालिका 
  • भारत के संविधान में स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है जो सभी प्रकार के हस्तक्षेपों से मुक्त हैं। 
  • देश में सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय व जिला स्तर पर जिला न्यायालय स्थापित है।

10.नीति-निदेशक तत्व का उल्लेख 
  • भारतीय संविधान में नागरिकों की आर्थिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक उन्नति के लिए नीति निर्देशक तत्वों की व्यवस्था है। 
  • इन तत्वों के पीछे न्यायालय के प्रवर्तन की शक्ति नहीं तथापि यह हमारे देश के शासन के मूल अधिकार हैं। 

11.लिखित तथा स्वनिर्मित 
  • हमारा संविधान लिखित व स्वनिर्मित है। 
  • हमारे संविधान में केंद्र और राज्य की शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है। 
  • हमारा संविधान निश्चित समय में भारतीयों द्वारा बनाया गया है, अट्टा या निर्मित संविधान है। 

12.वयस्क मताधिकार 
  • भारतीय संविधान द्वारा देश की सभी वयस्क (18 वर्ष आयु प्राप्त) स्त्री व पुरुष नागरिकों को मतदान का अधिकार प्रदान किया गया है चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय का हो। 

13.एकल नागरिकता 
  • राष्ट्रीय की भावात्मक एकता को पुष्ट करते हुए भारतीय संविधान ने एकहरी नागरिकता की व्यवस्था की है।
  • यहां सभी नागरिक केवल भारत के नागरिक है, राज्यों के नहीं 

14.आपातकालीन व्यवस्था 

भारतीय संविधान में संकटकालीन अपबंधों की व्यवस्था किया है,जिसके अनुसार संघात्मक शासन एकात्मक हो जाताहै।

महामहिम राष्ट्रपति निम्न परिस्थितियों में आपातकाल की उद्घोषणा कर सकते हैं-

  • युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह होने पर (अनुच्छेद 352) 
  • राज्यों में संवैधानिक तंत्र के सफल हो जाने पर (अनुच्छेद 356) 
  • वित्तीय संकट उत्पन्न होने पर (अनुच्छेद 360) 

15.लोक- कल्याणकारी राज्य की स्थापना 
  • भारतीय संविधान द्वारा लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है। 
  • जिसमें किसी के श्रम अथवा स्वास्थ्य का दुरुपयोग ना होगा, 
  • सभी नागरिकों को आर्थिक सामाजिक तथा राजनीतिक न्याय प्राप्त होगा 
  • सभी को समान अवसर प्राप्त होंगे अर्थात भारत में लोक कल्याणकारी राज्य स्थापित होगा। 

16.एक राष्ट्र भाषा की व्यवस्था 

राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए संविधान द्वारा देवनागरी लिपि में हिंदी को राष्ट्रभाषा का पद प्रदान कियागया है। 

17.अस्पृश्यता का अंत 
  • प्राचीन काल से ही अस्पृश्यता राष्ट्रीय एकता के लिए बाधक रही है इसलिए संविधान के अनुच्छेद 17 के द्वारा स्पर्श रेखा का अंत कर दिया गया है। 

स्पष्ट उल्लेख है कि “अस्पृश्यता का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषेध किया जाता है। 

अस्पृश्यता से उपार्जित निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा।”

18.ग्राम पंचायत की स्थापना 

देश के सर्वोत्तम कल्याण के लिए स्थानीय स्वशासन के अंतर्गत ग्राम पंचायत की स्थापना की गई है। 

19.मौलिक कर्तव्य 
  • मौलिक कर्तव्यों के महत्व को ध्यान में रखते हुए संविधान के 42 वें संशोधन 1976 द्वारा चौथा अध्याय में अनुच्छेद 51A जोड़ा गया। जिसमें 10 मौलिक कर्तव्यों को शामिल किया गया। 
  • इसके बाद दिसंबर 2002 में लागू किए गए 86वें संवैधानिक संशोधन द्वारा एक अन्य मौलिक कर्तव्य को शामिल किया गया। 
  • इसके परिणाम स्वरुप मौलिक कर्तव्यों की कुल संख्या 11 हो गई। 

20.अल्पसंख्यकों व कमजोर वर्गों को संरक्षण 
  • भारतीय संविधान को आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तन का एक यंत्र भी बनाया गयाहै।
  • इस उदय की पूर्ति के लिए संविधान में अल्पसंख्यकों अनुसूचित जातियों व जनजातीय तथा पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए अनेक प्रावधान किए गए हैं। 

प्रमुख तिथियां 

संविधान सभा का चुनाव 1946
जवाहरलाल नेहरू द्वारा संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत 13 सितम्बर, 1946
राजचिह अपनाया गया 26 जनवरी, 1950
संविधान लागू किया गया 26 जनवरी, 1950
संविधान सभी की प्रथम बैठक 9 दिसम्बर 1946
राष्ट्रध्वज अपनाया गयां 22 जुलाई 1947
भारत स्वतन्त्र हुआ 15 अगस्त 1947
संविधान, संविधान सेभा में अंगीकृत 26 नवम्बर 1949
राष्ट्रगान (जन-गण-मन) अपनाया गया 24 जनवरी 1950

भारतीय संविधान का स्वरूप

भारतीय संविधान का स्वरूप संघात्मक है या एकात्मक यह प्रश्ने विवादास्पद है। संविधान के आलोचकों का कहना संविधान संघात्मक होते हुए भी एकात्मकता के लक्षणों से परिपूर्ण है।

प्रो० डी० एन० बनर्जी के अनुसार “भारत के संविधान का स्वरूप संघात्मक, परन्तु उसमें एकात्मकता की स्पष्ट झलक है।”

दुर्गादास बसु के अनुसार “भारतीय संविधान न तो पूर्णतया संघात्मक है और न पूर्णतया एकात्मक,वरन् दोनों का मिश्रण है।”

भारतीय संविधान के संघात्मक लक्षण (विशेषताएं)

1.लिखित व कठोर संविधान 
  • संघीय शासन की व्यवस्था के अनुसार भारतीय संविधान लिखित व कठोर है।
  • संविधान के अनुच्छेद 368 के द्वारा कतिपय संघीय उपबन्धो में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों के ⅔ बहुमत तथा कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलो की स्वीकृति आवश्यक होती है।
  • संशोधन की यह जटिलता संविधान को संघात्मक की श्रेणी प्रदान करती है।

2.संविधान की सर्वोच्चता 
  • भारत में संविधान सर्वोच्च है, क्योंकि संघ और राज्य दोनों ही संविधान से शक्तियां प्राप्त करते हैं।
  • दोनों ही संविधान के उपबंध को करने के लिए बाध्य है।

3.केन्द्र तथा राज्यों के बीच शक्ति का विभाजन 

भारतीय संविधान में केंद्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है, जिसके फल स्वरुप या संघीय संविधान है। 

शासन की शक्तियों के संबंध में तीन सूचियां की व्यवस्था की गई है-

(i) केंद्रीय सूची- इसमें 100 विषय रखे गए हैं और इन पर केवल केंद्र सरकार को कानून बनाने का अधिकार है।

(ii) राज्य सूची– इसमें 61 विषय रखे गए हैं और इस पर केवल राज्य सरकार को कानून बनाने का अधिकार है। 

(iii) समवर्ती सूची– इसमें 52 विषय रखे गए हैं और इन पर दोनों सरकारें कानून बना सकती है। 

किंतु यदि एक ही विषय पर दोनों सरकारी कानून बनाएं और विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो केंद्र सरकार द्वारा बनाया गया कानूनी मान्य होगा और राज्य निर्मित कानून रद्द माना जाएगा। 

4.स्वतंत्र न्यायपालिका- 
  • भारतीय सर्वोच्च न्यायालय को वे सभी शक्तियां संविधान द्वारा प्रदान की गई है, जो प्रयास संघात्मक शासन में सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त होती है। 
  • भारत का सर्वोच्च न्यायालय संविधान का रक्षक है इसे संविधान द्वारा किसी भी हस्तक्षेप से मुक्त रखा गया है। 
  • डॉ राजेंद्र प्रसाद ने ठीक ही कहा है “हमने संविधान में एक ऐसी न्यायपालिका की व्यवस्था की है, जो स्वतंत्र होगी।”

भारतीय संविधान के एकात्मक लक्षण (विशेषताएं) 

भारतीय संविधान में एकात्मक शासन के निम्न लक्षण विद्यमान है। 

1.शक्तिशाली केंद्र 
  • भारतीय संविधान द्वारा शक्तियों का विभाजन केंद्र के पक्ष में किया गया है। 
  • सभी महत्वपूर्ण विषयों को केंद्रीय सूची में रखा गया है। 
  • समवर्ती सूची पर दोनों ही सरकारों को कानून बनाने का अधिकार है, किंतु दोनों के कानून के विरोध की स्थिति में केंद्र सरकार के कानून को प्राथमिकता प्राप्त है। 
  • अवशिष्ट विषय पर कानून बनाने का अधिकार संसद को ही है 

2.शांतिकाल में भी केंद्र शक्तिशाली 

संकटकालीन स्थिति का अतिरिक्त शांति काल में भी केंद्र सरकार को निम्न स्थितियों में राज्य सूची के विषय पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है-

  • प्रथम- जब राज्यसभा उपस्थित सदस्यों के 2/3 बहुमत से यह प्रस्ताव पारित कर दे कि राज्य सूची के अमुक विषय पर केंद्र द्वारा कानून बनाया जाना राष्ट्रीय हित में आवश्यक है। 
  • द्वितीय- जब दो या दो से अधिक राज्य यह प्रस्ताव पारित कर दे कि केंद्र राज्य सूची में दिए गए विषयों पर कानून बनाएं। 
  • इस प्रकार शांति काल में भी संविधान एकात्मक हो जाता है। 

3.संघ और राज्यों के लिए एक ही संविधान 
  • भारत में संघ और राज्य दोनों के लिए एक ही संविधान की व्यवस्था है। 
  • जबकि संघात्मक व्यवस्था वाले देशों में संघ और राज्य दोनों को अपना अपना संविधान बनाने का अधिकार होता है। 

4.केंद्र सरकार को राज्य की सीमाओं में परिवर्तन करने, नए राज्य का निर्माण करने तथा राज्य का नाम बदलने का अधिकार है। 

5.राज्यों को संविधान में संशोधन करने का कोई अधिकार नहीं है। 

6.एकल नागरिकता एवं इकहरी न्यायपालिका, इकहरी राष्ट्रभाषा की व्यवस्था है। 

7.राष्ट्रपति ही राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति करता है। 

8.राजू को केंद्र से अलग होने का अधिकार नहीं। 

9.अंतरराष्ट्रीय मामलों पर संघ का एकाधिकार। 

10.राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार को है, राज्यों को नहीं।

11.राष्ट्रपति के संकटकालीन प्रावधान 
  • भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों में संकटकाल की घोषणा करने का अधिकार है। 
  • जब राष्ट्रपति राज्य में संकटकालीन अधिकार का प्रयोग करता है तो उसे स्थिति में राज्य के शासन का सीधा संबंध संघ से हो जाता है। 
  • ऐसी स्थिति में संघ की शक्तियां बढ़ जाती है जिससे एकात्मक शासन को बल मिलता है। 

12.भारतीय संघ में संपूर्ण भारत  के लिए एकीकृत न्यायालयों की व्यवस्था की गई।

13.संसद के उच्च सदन राज्यसभा में राज्यों को समान प्रतिनिधित्व नहीं प्राप्त है। 

14.भारतीय संघ में संघ शासित प्रदेशों का अस्तित्व विद्यमान है। 

15.राज्य आर्थिक दृष्टि से केंद्र पर निर्भर है। 

बहुविकल्पीय प्रश्न 

1.भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में कितनी सचिया है? 

(क) एक       (ख) दो         (ग) तीन      (घ) चार

2.भारत का गणतंत्र दिवस है-

(क) 26 जनवरी      (ख) 26 नवंबर        

(ग)  15 अगस्त।      (घ) 2 अक्टूबर

3.संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष थे-

(क) सरदार पटेल              (ख) डॉ राजेंद्र प्रसाद       

(ग) डॉ भीमराव अंबेडकर     (घ) पंडित जवाहरलाल नेहरू 

4.संविधान सभा का स्थाई अध्यक्ष थे-

(क) डॉ राजेंद्र प्रसाद      (ख) डॉ भीमराव अंबेडकर         

(ग) सरदार पटेल           (घ) इनमें से कोई नहीं

5.संविधान सभा के अस्थाई अध्यक्ष थे-

(क) डॉ राजेंद्र प्रसाद           (ख) सच्चिदानंद सिन्हा       

(ग) डॉ भीमराव अंबेडकर      (घ) इनमें से कोई नहीं

6.संविधान द्वारा नागरिकों को मूल अधिकार प्राप्त हैं-

(क) छह       (ख) सात         (ग) नौ      (घ) पांच

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