Dr hajari Prasad Dwivedi ka jivan Parichay, डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय, साहित्य योगदान व भाषा शैली 

Share This Post

Dr hajari Prasad Dwivedi ka jivan Parichay, डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय, साहित्य योगदान व भाषा शैली 

दोस्तों इस पोस्ट में, डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय के बारे में, साहित्य योगदान के बारे में और उनकी भाषा शैली क्या है इसके बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी से संबंधित बोर्ड परीक्षा में प्रश्न भी पूछे जाते हैं अर्थात डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी की जीवन परिचय को जानना हमारे बहुत ज्यादा आवश्यक है। इनके जीवन परिचय, साहित्य योगदान और भाषा शैली से संबंधित संक्षिप्त जानकारी निम्न दी गई है। 

बोर्ड परीक्षा में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न

  • डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए।
  • डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्य परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए।
  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की भाषा शैली की समीक्षा कीजिए।

Dr hajari Prasad Dwivedi ka jivan Parichay, डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय, साहित्य योगदान व भाषा शैली

जीवन-परिचय

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के आरत दुबे का छपरा,ओझवलिया नामक गाँव में एक सरयूपारीय ब्राह्मण परिवार में 19 अगस्त 1907ई० को हुआ था। इनके पिता का नाम श्री अनमोल द्विवेदी और माता का नाम श्रीमती ज्योतिष्मती था। इनका परिवार ज्योतिष विद्या के लिए प्रसिद्ध था। इनके पिता पं॰ अनमोल द्विवेदी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। द्विवेदी जी के बचपन का नाम वैद्यनाथ द्विवेदी था। पारिवारिक परम्परा के अनुसार इन्होंने प्रारम्भ में संस्कृत का अध्ययन किया और 1930 ई० में काशी विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसी वर्ष प्राध्यापक होकर शान्ति निकेतन चले गये। 1940 ई0 से 1950 ई0 तक वहाँ हिन्दी भवन के निदेशक के पद पर कार्य करते रहे। 

कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ टैगोर, आचार्य क्षितिमोहन सेन आदि के सम्पर्क से ये साहित्य-साधना की ओर उन्मुख हुए। 1950 ई० में ये काशी विश्वविद्यालय में हिन्दी-विभाग के अध्यक्ष पद पर नियुक्त हुए। इससे एक वर्ष पूर्व ही लखनऊ विश्वविद्यालय ने इनको डी० लिट्० की सम्मानित उपाधि से विभूषित किया। भारत सरकार ने 1957 ई0 में इन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि प्रदान की। 1960 से 1966 ई० तक ये चण्डीगढ़ विश्वविद्यालय में हिन्दी-विभाग के अध्यक्ष रहे। इसके पश्चात् इन्होंने भारत सरकार की हिन्दी-सम्बन्धी विविध योजनाओं का उत्तरदायित्व सँभाला था। इनका देहान्त 19 मई, 1979 ई0 को हो गया।

कृतियाँ

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी गद्य क्षेत्र में उपन्यास, आलोचना, निबन्ध और इतिहास-सम्बन्धी बहुत से ग्रन्थ लिखें है, जिनमें से कुछ निम्न दिये गये है –

उपन्यास – बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचंद्र लेख, अनामदास का पोथा, पुनर्नवा।

साहित्यिक, शास्त्रीय और आलोचनात्मक ग्रंथ – सूरदास, कबीर, साहित्य का मर्म, साहित्य सहचर, कालिदास की लालित्य योजना,मेघदूत: एक पुरानी कहानी,मृत्युंजय रवीन्द्र, आधुनिक हिन्‍दी साहित्‍य पर विचार ।

निबंध संग्रह- अशोक के फूल, कुटज, विचार प्रवाह, विचार और वितर्क, कल्पलता, आलोक पर्व।

इतिहास- हिंदी साहित्य का आदिकाल, हिंदी साहित्य की भूमिका, हिंदी साहित्य।

सम्पादन – संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, प्रबन्ध चिंतामणि, मेरा बचपन ।

साहित्य योगदान

आधुनिक युग के गद्यकारों में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनकी रचनाओं में प्राचीनता और नवीनता का अपूर्व समन्वय हुआ है। उनके विषय-विवेचन में गम्भीरता और शालीनता स्पष्ट रूप में प्रतिबिम्बित होती है। हिन्दी-गद्य के क्षेत्र में उनकी साहित्यिक सेवाओं का आकलन इस प्रकार किया जा सकता है-

 

निबन्धकार के रूप में

डॉ० द्वारिकाप्रसाद सक्सेना के अनुसार “आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी आधुनिक युग के मूर्धन्य निबन्धकार थे। उनके निबन्धों में अद्यतन विचारधाराएँ किसी-न-किसी रूप में विद्यमान हैं। उनके अधिकांश निबन्ध विचारात्मक निबन्धों की कोटि में आते हैं। विचारात्मक निबन्धों की परम्परा में आपका योगदान सर्वथा सराहनीय है। आचार्य हजारीप्रसाद ने विचारात्मक निबन्धों की रचना करके भारतीय साहित्य एवं संस्कृति की परम्परा को अखण्ड बनाये रखने का स्तुत्य प्रयास किया और आलोचनात्मक एवं व्यक्तिपरक निबन्ध लिखकर हिन्दी-निबन्ध-कला को अधिकाधिक प्रांजल एवं परिमार्जित बनाने का श्रेय प्राप्त किया।”

आचार्य द्विवेदी के निबन्धों में जहाँ साहित्य और संस्कृति की अखण्ड धारा प्रवाहित है, वहीं नित्य-प्रति के जीवन की विविध गतिविधियों, क्रिया-व्यापारों, अनुभूतियों आदि का चित्रण भी अत्यन्त सजीवता और मार्मिकता के साथ हुआ है।

उपन्यासकार के रूप में

द्विवेदीजी ने चार महत्त्वपूर्ण उपन्यासों की रचना की है, जिनके नाम हैं- ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’,’चारुचन्द्र लेख’, ‘पुनर्नवा’ और ‘अनामदास का पोथा’। सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित ये उपन्यास द्विवेदीजी की गम्भीर विचार- शक्ति के प्रमाण हैं। इतिहास और कल्पना के समन्वय द्वारा लेखक ने अपने उपन्यास-साहित्य को आकर्षक रूप प्रदान किया है। 

ललित निबन्धकार के रूप में

द्विवेदीजी ने ललित निबन्ध के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण लेखन-कार्य किया है। हिन्दी के ललित निबन्ध को व्यवस्थित रूप प्रदान करने वाले निबन्धकार के रूप में आचार्य हजारीप्रसाद अग्रगण्य हैं। द्विवेदी जी के ललित निबन्धों में रसास्वादन की अपूर्व क्षमता विद्यमान है। उनमें भावुकता, सरसता और कोमलता के साथ-साथ आवेगपूर्ण प्रतिपादन की शैली विद्यमान है। निश्चय ही ललित निबन्ध के क्षेत्र में वे युग प्रवर्तक लेखक रहे हैं।

आलोचक के रूप में

आलोचना साहित्य में द्विवेदीजी महत्त्वपूर्ण स्थान के अधिकारी हैं। उनकी आलोचनात्मक कृतियों में विद्वत्ता और अध्ययनशीलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ में उन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास पर एक नवीन दृष्टिकोण से विचार किया है। द्विवेदी जी ने पहली बार हिन्दी साहित्य के इतिहास पर विश्लेषणात्मक ढंग से प्रकाश डाला। ‘हिन्दी साहित्य का आदिकाल’ में द्विवेदी जी ने नवीन उपलब्ध सामग्री के आधार पर शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया। ‘नाथ सम्प्रदाय’ में सिद्धों और नाथों की उपलब्धियों पर गम्भीर विचार व्यक्त किये। ‘सूर-साहित्य’ उनकी प्रारम्भिक आलोचनात्मक कृति है। इसमें भावात्मकता अधिक है। इसके अतिरिक्त उनके अनेक मार्मिक और समीक्षात्मक निबन्ध विभिन्न निबन्ध संग्रहों में संग्रहीत हैं।

भाषा-शैली

1.भाषागत विशेषताएँ

द्विवेदीजी की भाषा के दो रूप हैं 

  • व्यावहारिक भाषा
  • संस्कृतगर्भित भाषा।

 

व्यावहारिक भाषा

द्विवेदीजी के विचारात्मक निबन्धों में व्यावहारिक भाषा का प्रयोग हुआ है। इस भाषा में संस्कृत के सरल तत्सम शब्दों के साथ अमन, आसान, ईमानदारी, शौक, काबू आदि प्रचलित फारसी शब्दों तथा मैजिक, एस्ट्रोलॉजी जैसे व्यावहारिक अंग्रेजी शब्दों एवं दाँव-पेंच, नोच-खसोट जैसे देशज शब्दों का निःसंकोच प्रयोग हुआ है। यह भाषा अत्यन्त प्रवाहपूर्ण तथा साहित्यिक है।

संस्कृतगर्भित भाषा

भाषा का यह रूप उनकी आलोचनात्मक रचनाओं तथा उपन्यासों में पाया जाता है। इसमें संस्कृत तत्सम शब्दों की अधिकता, समासयुक्त शब्द तथा लम्बे-लम्बे वाक्यों का गठन पाया जाता है। यह भाषा अधिक प्रांजल तथा परिष्कृत है। ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ उपन्यास में द्विवेदीजी की भाषा-शैली कादम्बरी के लेखक बाणभट्ट की भाषा से मेल खाती है। संस्कृतगर्भित भाषा का एक उदाहरण प्रस्तुत है-

“सफलता और चरितार्थता में अन्तर है। मनुष्य धारणाओं के संचयन से, बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु को पा भी सकता है, जिसे उसने बड़े आडम्बर के साथ सफलता नाम दे रखा है।”

2. शैलीगत विशेषताएँ

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की गद्य शैली अति प्रौढ़ और गम्भीर है। वे शैली के स्वयं निर्माता थे। उनकी रचनाओं में हमें शैली के निम्नलिखित रूप देखने को मिलते हैं- 

विवेचनात्मक शैली

द्विवेदीजी ने ‘विवेचनात्मक शैली’ में लिखा है। इनकी शैली पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की काव्यात्मक शैली का प्रभाव पड़ा है, जिससे वह सरल तथा मधुर हो गयी है। इनकी शैली में रामचन्द्र शुक्ल की विशद् व्यापकता है, अतएव वह बोधगम्य तथा सरस है। ‘कुटज’ नामक निबन्ध से उद्धृत इनकी शैली का एक उद्धरण देखिए- 

“शिवालिक की सूखी नीरस पहाड़ियों पर मुस्कराते हुए ये वृक्ष द्वन्द्वातीत हैं, अलमस्त हैं। मैं किसी का नाम नहीं जानता, कुल नहीं जानता, शील नहीं जानता, पर लगता है वे जैसे मुझे अनादिकाल से जानते हैं।”

गवेषणात्मक शैली

शोधपूर्ण एवं पुरातात्त्विक निबन्धों में इस शैली का प्रयोग हुआ है। इसकी भाषा गम्भीर, सुगठित एवं संस्कृतनिष्ठ है। इसके वाक्य सुगठित एवं स्पष्ट हैं।

आलोचनात्मक शैली

कवियों एवं कृतियों की समीक्षा करते समय लेखक ने इस शैली का प्रयोग किया है। इसका वाक्य- विन्यास चुस्त एवं सुगठित है। इनकी भाषा आलोचनात्मक, गम्भीर एवं संयत है।

भावात्मक शैली

इस शैली का प्रयोग ललित निबन्धों में देखने को मिलता है। इनकी भाषा है। इसके वाक्य छोटे-छोटे एवं कसे हुए हैं। यहाँ भाषा का लालित्य देखते ही बनता है। सरस, ग्राह्य एवं माधुर्य से परिपूर्ण है। इसके वॉच छोटे-छोटे एवं कसे हुए हैं। यह भाषा का ललित देखते ही बनता है।

आत्मपरक शैली

भावुक स्थलों पर आपकी शैली आत्मपरक हो गयी है। इस शैली में भावुकता, मार्मिकता, सजीवता, काव्यात्मकता के दर्शन होते हैं जैसे –

“मुझे बुखार आ रहा है यह भी नियति का मजाक ही है। सारी दुनिया में हल्ला हो गया है कि बसन्त आ रहा है और मेरे पास आता है बुखार।”

इनके अतिरिक्त निबन्ध-साहित्य में आपने अन्य शैलियों का सुचारु एवं चमत्कारपूर्ण प्रयोग किया है-चिन्तनपरक गम्भीर शैली, विक्षेप शैली, उद्धरण शैली, तरंग शैली, विवरणात्मक शैली, इतिवृत्तात्मक शैली, व्यंग्यात्मक शैली आदि। व्यंग्यात्मक शैली का उदाहरण देखिए – “जब-जब मैं कलकत्ते के चिड़ियाघर में गया हूँ, तब-तब मुझे ऐसा लगा कि संसार के जीवों में सबसे गम्भीर और चिन्तामग्न चेहरा उस चिड़ियाघर में रखे हुए वन-मानुष का है।” “मैं समझता था कि कलकत्ते वाला वन-मानुष ही बहुत गम्भीर और तत्त्व चिन्तक लगता है। अब मैंने अपनी राय में संशोधन कर लिया है। वस्तुतः संसार के सभी वन-मानुष गम्भीर और तत्त्वदर्शी दिखाई देते हैं।”

महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न.1- डॉ हजारी प्रसाद का जन्म कब हुआ?

उत्तर – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के आरत दुबे का छपरा,ओझवलिया नामक गाँव में एक सरयूपारीय ब्राह्मण परिवार में 19 अगस्त 1907ई० को हुआ था

प्रश्न.2- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के माता – पिता का क्या नाम था?

उत्तर – इनके पिता का नाम श्री अनमोल द्विवेदी और माता का नाम श्रीमती ज्योतिष्मती था। इनका परिवार ज्योतिष विद्या के लिए प्रसिद्ध था।

प्रश्न.3- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के बचपन का नाम क्या था?

उत्तर – द्विवेदी जी के बचपन का नाम वैद्यनाथ द्विवेदी था।

प्रश्न.4- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ज्योतिषाचार्य की परीक्षा कब और कहां से वितरण की?

उत्तर – 1930 ई० में काशी विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसी वर्ष प्राध्यापक होकर शान्ति निकेतन चले गये।

प्रश्न.5- डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी की मृत्यु कब हुई?

उत्तर – इनका देहान्त 19 मई, 1979 ई0 को हो गया।

प्रश्न.6- पद्मभूषण की उपाधि भारत सरकार द्वारा कब प्रदान की गई?

उत्तर –भारत सरकार ने 1957 ई0 में इन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि प्रदान की।

 

Leave a Comment