UP Board Class 12 Previous Year Samanya Hindi Question Paper – यूपी बोर्ड कक्षा-12  समान्य हिन्दी पद्यांश पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न

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UP Board Class 12 Previous Year Samanya Hindi Question Paper – यूपी बोर्ड कक्षा-12  समान्य हिन्दी पद्यांश पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न : 

इस पोस्ट में मैंने 12वी सामान्य हिन्दी, यूपी बोर्ड इंटरमीडिएट संस्कृत पद खंड पर आधारित प्रश्न को बताया है। जो बोर्ड परीक्षा में पिछले 2019 से लेकर आज तक पूछें गये है। यहां दिये गये सभी प्रश्न सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रश्न पिछले कई वर्षों से लगातार यूपी बोर्ड परीक्षा में पूछा जा रहा है। इसलिए यहां दिए गए सभी प्रश्नों को जरूर तैयार कर ले।

UP Board Class 12 Previous Year Samanya Hindi Question Paper - यूपी बोर्ड कक्षा-12  समान्य हिन्दी पद्यांश पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न

Samanya Hindi Padyansh Prashn

दिए गए पद्यांश पर आंधारित निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए

 

प्रश्न-1

सूखी जाती मलिन लतिका जो घरा में पड़ी हो।

तो पावों के निकट उसको श्याम के ला गिराना।।

यों सीधे से प्रकट करना प्रीति से वंचिता हो।

मेरा होना अति मलिन औ सूखते नित्व जाना।।

कोई पत्ता नवल तरु का पीत जो हो रहा हो।

तो प्यारे के दृग युगल के सामने ला उसे ही।।

धीरे-धीरे संभल रखना ओ उन्हें यो बताना।

पीला होना प्रबल दुख से प्रोषिता-सा हमारा।

(क) राधा सूखी और मलिन लतिका के माध्यम से पवन दूतिका के द्वारा क्या सन्देश दिलाना चाहती हैं?

उत्तर – राधा सुखी और मलिन लतिका के माध्यम से पवन दूतिका के द्वारा यह संदेश देना चाहते हैं कि राधा भी आपके वियोग में सूखती और मलिन होती जा रही है।

(ख) उपर्युक्त उद्धरणों में व्यक्त रस का नाम लिखकर उसके स्थायी भाव का उल्लेख कीजिए।

उत्तर – प्रस्तुत उद्धरण में वियोग श्रृंगार रस है तथा इसका स्थायी भाव रति है।

(ग) रेखांकित अंश का भावार्थ लिखिए।

उत्तर – राधा कहती है कि है पवन! यदि किसी नए वृक्ष का कोई पत्ता पीला पड़ गया हो तो उसे प्रिया के सामने धीरे से रख देना और उन्हें बताना कि इस प्रकार मैं भी प्रोषित पति का नायिका के समान पीली पड़ती जा रही है।

(घ) ‘प्रोषिता-सा’ में कौन-सा अलंकार है?

उत्तर – ‘प्रोषिता-सा’ में उपमा अलंकार है।

(ङ) कविता का शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।

उत्तर – इस पद्यांश के पाठ का शीर्षक ‘पवन-दूतिका’ तथा इसके रचयिता ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध’ हैं।

 

प्रश्न-2

कारा की संस्कृति विगत, भित्ति 

बहु धर्म-जाति-गति रूप नाम,

वंदी जग-जीवन, भू विभक्त

विज्ञान-मूढ़ जन प्रकृति-कम,

आये तुम मुक्त पुरुष, कहने

मिथ्या जड़ बन्धन, सत्य राम, 

नानृतं जयति सत्यं मा भैः,

जय ज्ञान-ज्योति तुमको प्रणाम।

 

(क) विगत संस्कृति की कौन-कौन सी दीवारें थी?

उत्तर – विगत संस्कृति की दीवार धर्म, जाति, अर्थ, शिक्षा, रूप, ख्याति आदि थी। भारत के लोग इन दीवारों के बंधनों में जकड़े हुए थे। अर्थात इन सब में सामान्य जन,-जीवन कैद था।

(ख) ‘जड़ बन्धन मिथ्या है और राम सत्य है’ यह उ‌द्घोष करने कौन आया?

उत्तर – ‘जड़ बंधन मिथ्या है और राम सत्य हैं’ यह उद्घोष महात्मा गांधी लाए थे। उन्होंने यह संदेश फैलाया था कि सांसारिक बंधन रिश्ते नाते सब झूठे और दिखावटी हैं। केवल ईश्वर का नाम ही एकमात्र सत्य और शाश्वत है।

(ग) ‘नानृतं जयति सत्यं’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘नानृतं जयति सत्यं’का अर्थ है कि सत्य की नहीं बल्कि सर्वदा सत्य की ही जीत होती है। अतः सत्य हमेशा जितना है।

(घ) रेखांकित अंश का भावार्थ लिखिए।

उत्तर – इस पदंश के माध्यम से कवि पंत जी कहते हैं कि यहां के लोग धर्म, जाति, अर्थ, शिक्षा, रूप, ख्याति आदि बहुत से बंधनों में जगड़े हुए थे। अर्थात यहां का सामान्य जन-जीवन ही कैद था। यहां की धरती क्षेत्रीयता भाषावाद जैसे कई आधारों पर बटी हुई थी। विज्ञान के प्रभाव में आकर यहां के लोग अविवेक हो प्रकृति का उपभोग अपनी इच्छा के अनुरूप करना चाहते थे। किंतु लंबे समय से गुलामी का डांस झेलने वाले भारतीयों के लिए उद्धारक (बंधन मुक्त करने वाले) बनकर आने वाले हे बापू! 

(ङ) कविता का शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।

उत्तर – कविता का शीर्षक ‘बापू के प्रति’ तथा कवि का नाम ‘सुमित्रानंदन पंत’ हैं।

 

प्रश्न-3

चाँदनी रात का प्रथम प्रहर

हम चले नाव लेकर सत्वर

सिकता की सस्मित सीपी पर

मोती की ज्योत्स्ना रही विचर

लो पालें चढ़ीं, उठा लंगर।

मृदु मंद-मंद मंथर मंथर

लघु तरणि हंसिनी सी सुन्दर

तिर रही खोल पालों के पर

निश्चल जल के शुचि दर्पण पर

प्रतिबिम्बित हो रंजत पुलिन निर्भर

दुहरे ऊँचे लगते क्षण भर

काला काँकर का राजभवन

सोया जल में निश्चिन्त प्रमन

पलकों पर वैभव स्वप्न सघन

(i) कवि नौका विहार हेतु किस समय प्रस्थान करते हैं?

उत्तर – कभी नौका विहार हेतु चांदनी रात के प्रथम पहर के समय प्रस्थान करते हैं तथा गंगा नदी के तट के सौंदर्य का वर्णन कर रहे हैं।

(ii) रात्रि में गंगा नदी की रेती की शोभा कैसी लग रही थी?

उत्तर – रात्रि में गंगा की रेत की शोभा अत्यंत मनोहर लग रही थी। गंगा का तट ऐसा रम्य लग रहा था, मानो खुली पड़ी रेतीली सीपी पर चंद्रमा रूपी मोती की चमक यानी चांदनी भ्रमण कर रही हो।

(iii) ‘लघु तरणि हंसिनी सी सुन्दर’ में कौन सा अलंकार है?

उत्तर – ‘लघु तरणि हंसिनी सी सुन्दर’पंक्ति में उपमा अलंकार है।

(iv) रेखांकित पद्यांश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – कभी पंत जी कहते हैं कि गंगा तट पर शोभित कलाकांकर के राजभवन का प्रतिबिंब गंगा जल में झलक रहा है। ऐसा लग रहा है मानो यह राजभवन गंगा जल रूपी शय्या पर निश्चिन्त होकर सो रहा है और उसकी झुकी पलकों एवं शांत मन में वैभवरूपी स्वप्न तैर रहे हैं।

(v) पाठ का शीर्षक तथा कवि का नाम बताइए।

उत्तर –पाठ का शीर्षक ‘नौका विहार’ तथा कवि का नाम ‘सुमित्रानंदन पंत’ है।

 

प्रश्न-4

समर्पण लो सेवा का सार

सजल संसृति का यह पतवार: 

आज से यह जोवन उत्सर्ग 

इसो पद तल में विगत विकार। 

बनो संसृति के मूल रहस्य 

तुम्हों से फैलेगी यह बेल; 

विश्वभर सौरभ से भर जाय 

सुमन के खेलो सुन्दर खेल।

(i) ‘समर्पण लो सेवा का सार’ किसने किससे कहा है?

उत्तर – ‘समर्पण लो सेवा का सार’ यह श्रद्धा ने मनु से कहा है कि वह स्वयं को मनु की जीवन संगिनी के रूप में स्वीकार कर लेने की इच्छा व्यक्त करती है।

(ii) ‘बनो संसृति के मूल रहस्य’ किसके लिए कहा गया है?

उत्तर – ‘बनो संसृति के मूल रहस्य’मनु के लिए कहा गया है। श्रद्धा मनु से स्वयं को पत्नी के रूप में स्वीकार कर इस निर्जन संसार में मानव की उत्पत्ति का मूलाधार बनने का आग्रह करती है।

(iii) ‘विश्वभर सौरभ से भर जाय’ का क्या आशय है?

उत्तर – ‘विश्वभर सौरभ से भर जाय’का आशय यह है कि सृष्टि के सुंदर खेलों को खेलने से संपूर्ण विश्व मानव रूप सुगंधित पुष्पों से सुवासित हो उठेगा और प्रकृति खुश होकर झूमने लगेगी।

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –श्रद्धा मनु से कहती है कि तुमने इस संसार की रचना करने वाले विधाता का कल्याणकारी वरदान नहीं सुना, जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘शक्तिशाली बनाकर विजय प्राप्त करो।’श्रद्धा कहती है कि हे देवपुत्र मनु! तुम इस नवीन सृष्टि का विकास करने के लिए तैयार हो जाओ। किसी भी प्रकार की आशंका से भयभीत न हो, क्योंकि कल्याणकारी उन्नति तुम्हारे सम्मुख है। तुम्हारा जीवन आकर्षण से भरा हुआ है। अतः सभी सुख संपन्नता और वैभव स्वयं ही तुम्हारे समझ उपस्थित हो जाएगा।

(v) पाठ का नाम तथा रचयिता का उल्लेख कीजिए।

उत्तर –पाठ का नाम ‘श्रद्धा मनु’ है तथा रचयिता का नाम ‘जयशंकर प्रसाद’ है।

 

प्रश्न-5

बैठी थी अचल तथापि असंख्या तरंगा 

वह सिंही अब थी हहा! गोमुखी गंगा 

हाँ जनकर भी मैंने न भरत को जाना 

सब सुन लें, तुमने अभी स्वयं यह माना 

यह सच है तो फिर लौट चलो घर भैया 

अपराधिन मैं हूँ तात, तुम्हारी मैया 

दुर्बलता का ही चिह्न विशेष शपथ है 

पर अबला जन के लिए कौन-सा पथ है?

(i) प्रस्तुत पद्यांश में किन-किन पात्रों के बीच संवाद हो रहा है?

उत्तर –प्रस्तुत पद्यांश में राम और कैकयी के बीच संवाद हो रहा है। राम की बात सुनकर माता कैकयी स्वयं को दोषी सिद्ध करती हुई, उनसे अयोध्या लौटने की बात करती है।

(ii) पाठ का शीर्षक एवं रचयिता के नाम का उल्लेख कीजिए।

उत्तर –पाठ का शीर्षक ‘कैकयी अनुताप’तथा रचयिता का नाम ‘मैथिलीशरण गुप्त’ है।

(iii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –कैकयी, भरत की सौगंध खाते हुए राम से कहती है कि सौगंध खाने से व्यक्ति की दुर्बलता प्रकट होती है, परंतु स्त्रियों के लिए इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है। 

(iv) घर लौट चलने के लिए कौन किससे आग्रह कर रहा है?

उत्तर –घर लौट चलने के लिए कैकयी राम से आग्रह कर रही है।

(v) सिंहीं और गोमुखी गंगा से क्या अभिप्राय है?

उत्तर – सिंहनी का अभिप्राय सिंहनी तथा गोमुखी गंगा का गाय के मुख वाली है। 

प्रश्न-6

सूखी जाती मलिन लतिका जो धरा में पड़ी हो 

तो पाँवों के निकट उसको श्याम के ला गिराना।। 

यों सीधे से प्रकट करना प्रीति से वंचिता हो 

मेरा होना अतिमलिन औ सूखते नित्य जाना।।

कोई पत्ता नवल तरु का पीत जो हो रहा हो 

तो प्यारे के दृग युगल के सामने ला उसे ही। 

धीरे-धीरे सँभल रखना औ उन्हें यों बताना 

पीला होना प्रबल दुख से प्रोषिता-सा हमारा।।

(1) राधा पवन से पृथ्वी पर पड़ी हुई लता को क्या करने के लिए कहती है?

उत्तर – राधा पवन से पृथ्वी पर पड़ी हुई लता को कृष्ण के पैरों के पास ले जाकर रखने के लिए कहती है।

(ii) सूखी लता से राधा कृष्ण को क्या संदेश देना चाहती हैं?

उत्तर –सुखी लता से राधा कृष्ण को यह संदेश देना चाहती है कि उनके वियोग में वह भी इस लता के समान हो गई है अर्थात उनके प्रेम से विहीन रहकर वह मुरझाकर सूखती जा रही है।

(iii) पीले पत्ते को श्रीकृष्ण के सामने लाने से राधा का क्या अभिप्राय है?

उत्तर –पीले पत्ते को श्री कृष्ण के सामने लाने से राधा का अभिप्राय यह है कि इस पत्ते के माध्यम से वह कृष्ण को अपनी स्थिति का आभास करना चाहती है कि वह भी पेट के समान दिन प्रतिदिन पीली पड़ती जा रही है।

 

(iv) उपर्युक्त पद्यांश की रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –राधा पवन से कहती है कि यदि नए पेड़ के पीले पड़ गए पत्ते पर तुम्हारी दृष्टि पड़े तो तुम हमारे प्रियतम की आंखों के आगे उसे धीरे से रख देना और उन्हें बताना कि पति से बिछड़ी हुई स्त्री के समान में भी नित्य पीली पड़ती जा रही हूं।

(v) पाठ का शीर्षक तथा रचयिता के नाम का उल्लेख कीजिए।

उत्तर –पाठ के शीर्षक का नाम ‘पवन दूतिका’ है तथा रचयिता का नाम ‘अयोध्या सिंह उपाध्याय’ है। 

 

प्रश्न-7

छायाएँ मानव-जन की दिशाहीन

सब ओर पड़ीं वह सूरज

नहीं उगा था पूरब में, वह

बरसा सहसा

बीचों-बीच नगर के,

काल-सूर्य के रथ के

पहियों के ज्यों अरे टूट कर

बिखर गए हों

दशों दिशा में

(i) मानव जन की छायाएँ किस दिशा में पड़ी?

उत्तर –मानव जान की छायाएं दिशाहीन होकर सब और पड़ी हुई थी अर्थात परमाणु विस्फोट के कारण हर तरफ मानव की छवियों से पूरा वातावरण पटा हुआ था और वह यूं ही धरती पर चारों ओर बिखरी पड़ी थी।

(ii) वह सूरज किस दिशा में उदित हुआ था?

उत्तर –वह सूर्य प्रतिदिन की तरह पूर्व दिशा से उदित नहीं हुआ था, बल्कि उसका उदय अचानक ही हिरोशिमा के मध्य स्थित भूमि से हुआ था।

(iii) ‘काल-सूर्य’ के रथ-पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?

उत्तर –‘काल-सूर्य के रथ’ में रूपक अलंकार है।

(iv) दस दिशाएँ कौन-कौन सी है?

उत्तर –दस दिशा इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण नैऋत्य, पश्चिम,वायव्य, उत्तर और कंधों। 

(v) इस पद्यांश के पाठ तथा उसके रचयिता का नामोल्लेख कीजिए।

उत्तर –पाठ का नाम हिरोशिमा तथा लेखक का नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय है

 

प्रश्न-8

सावधान, मनुष्य। यदि विज्ञान है तलवार, 

तो इसे दे फेंक, तजकर मोह, स्मृति के पार। 

हो चुका है सिद्ध, है तू शिशु अभी अज्ञान, 

फूल काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान। 

खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार, 

काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार।

(i) कवि मनुष्य को सावधान क्यों कर रहा है?

उत्तर-कवि मनुष्य को सावधान इसलिए कर रहा है क्योंकि मनुष्य ने प्रकृति को नियंत्रित करने की इच्छा, से जिन नवीन वैज्ञानिक उपकरणों एवं खोजों को जन्म दिया उनसे वातावरण में विनाश की परिस्थितियों उत्पन्न हो गई है। 

(ii) मनुष्य को अज्ञान शिशु क्यों कहा गया है?

उत्तर –मनुष्य को अज्ञान शिशु इसलिए कहा गया है क्योंकि मनुष्य वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रति अत्यधिक मोह रखता है तथा वह विज्ञान के परिणामों के प्रति सचेत नहीं है।

(iii) किसकी धार बड़ी तीखी है?

उत्तर –विज्ञान रूपी तलवार की धार बड़ी तीखी होती है। इस विज्ञान रूपी तलवार पर मनुष्य का नियंत्रण प्राप्त कर पाना मुश्किल है। अतः कवि मनुष्य को आगाह करता है कि इस तलवार से खेलना छोड़ दो क्योंकि यह मानव जाति के हित में नहीं है। 

(v) पाठ का शीर्षक एवं कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –इस पाठ का शीर्षक अभिनव मनुष्य है तथा कवि का नाम रामधारी सिंह दिनकर है। 

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –कवि दिनकर जी अभिनव मानव को सावधान करते हुए कहते हैं कि हे मानव! तू विज्ञान रूपी शिक्षक धार वाली तलवार से खेलना छोड़ दे। यह मानव समुदाय के हित में नहीं है।

 

प्रश्न-9

निरख सखी, ये खंजन आए,

फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाए। 

फैला उनके तन का आतप, मन से सर सरसाए,

घूमे वे इस ओर वहाँ, ये हंस यहाँ उड़ छाए।

करके ध्यान आज इस जन का निश्चय वे मुसकाए,

फूल उठे हैं कमल, अधर-से यह बन्धूक सुहाए।

स्वागत स्वागत शरद भाग्य से मैंने दर्शन पाए, 

नभ ने मोती वारे लो ये अश्नु अर्घ्य भर लाए।।

(i) प्रस्तुत गीत में कौन किसके लिए कह रहा है?

उत्तर –प्रस्तुत पद्यांश में वियोगिनी उर्मिला शरद ऋतु के आगमन के बहाने अपने प्रियतम के लिए कह रही है। 

(ii) गीत में किस ऋतु का वर्णन किया गया है?

उत्तर –प्रस्तुत काव्यांश में शरद ऋतु का वर्णन है

(iii) ‘अधर-से’ में कौन-सा अलंकार है?

उत्तर –

(iv) रेखांकित अंश का भावार्थ क्या है?

उत्तर –

(v) कविता का शीर्षक और कवि का नाम बताइए।

उत्तर –

 

प्रश्न-10

आज की दुनिया विचित्र, नवीन; 

प्रकृति पर सर्वत्र है विजयी पुरुष आसीन। 

हैं बँधे नर के करों में वारि, विद्युत, भाप, 

हुक्म पर चढ़ता-उतरता है पवन का ताप।

हैं नहीं बाकी कहीं व्यवधान, 

लाँघ सकता नर सरित, गिरि, सिन्धु एक समान।

(i) आज के मनुष्य ने किस पर विजय प्राप्त कर ली है?

उत्तर –आज के मनुष्य ने वैज्ञानिक प्रगति के द्वारा प्रकृति से संघर्ष करते हुए सभी क्षेत्रों में विजय प्राप्त कर ली है। अतः प्रकृति के सभी अंगों और क्षेत्रों पर उसका पूर्ण नियंत्रण हो गया है।

(ii) किसके हुक्म पर पवन का ताप चढ़ता-उतरता है?

उत्तर –मनुष्य के हुक्म पर पवन का ताप चढ़ता उतरता है क्योंकि मनुष्य ने जल, बिजली, वातावरण, तप आदि सभी पर नियंत्रण कर लिया है। हवा में मौजूद तप भी उसकी अनुमति से बदलता है।

(iii) ‘कहीं भी व्यवधान नहीं बाकी है’ का क्या अर्थ है?

उत्तर –‘कहीं भी व्यवधान नहीं बाकी है’ का अर्थ है कि मनुष्य के सामने अब कोई भी ऐसी समस्या नहीं है, कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जो उसके मार्ग में किसी तरह का व्यवधान उत्पन्न कर सके।

(iv) रेखांकित पंक्ति का भावार्थ लिखिए।

उत्तर –कभी दिनकर जी कहते हैं कि आज की दुनिया नई तो है, किंतु बड़ी विचित्र है। आज मनुष्य ने वैज्ञानिक प्रगति के द्वारा प्रकृति से संघर्ष करते हुए सभी क्षेत्रों में विजय प्राप्त कर ली है।

(v) कविता का शीर्षक तथा कवि का नाम बताइए।

उत्तर –कविता का शीर्षक ‘अभिनव मानव’ है और कवि का नाम रामधारी सिंह दिनकर है।

 

प्रश्न-11

लज्जाशीला पथिक महिला जो कहीं दृष्टि आये।

होने देना विकृत-वसना तो न तू सुन्दरी को।

जो थोड़ी भी श्रमित वह हो गोद ले श्रान्ति खोना।

होंठों की औ कमल-मुख की म्लानताएँ मिटाना।।

कोई क्लान्ता कृषक-ललना खेत में जो दिखावे।

धीरे-धीरे परस उसकी क्लान्तियों को मिटाना।

जाता कोई जलद यदि हो व्योम में तो उसे ला।

छाया द्वारा सुखित करना, तप्त भूतांगना को ।।

(i) वियोगिनी राधा लज्जाशील महिला के लिए पवन से क्या कहती है?

उत्तर –

(ii) राधा कृषक-ललना की थकावट को दूर करने के लिए पवन को क्या समझती है?

उत्तर –

(iii) ‘व्योम’ तथा ‘भूतांगना’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – 

(iv) रेखांकित अंश का भावार्थ लिखिए।

उत्तर –

 

(v) उपर्युक्त कविता का शीर्षक तथा कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

प्रश्न-12

घिर रहे थे घुँघराले बा

अंश अवलम्बित मुख के पास;

नील घन-शावक-से सुकुमार

सुधा भरने को विधु के पास।

और मुख पर वह मृदु मुसक्यान

रक्त किसलय पर ले विश्राम;

अरुण की एक किरण अम्लान

अधिक अलसाई हो अभिराम।

 

(1) यहाँ किसकी सुन्दरता का मनोरम वर्णन किया गया है?

उत्तर – 

 

(ii) ‘अरुण की एक किरण अम्लान अधिक अलसाई हो अभिराम’ में कौन-सा अलंकार है?

उत्तर –

 

(iii) ‘अम्लान’ तथा ‘अभिराम’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

 

(iv) रेखांकित अंश का भावार्थ लिखिए।

उत्तर –

 

(v) उपर्युक्त कविता का शीर्षक तथा कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

प्रश्न-13

“कहते आते थे यही अभी नरदेही,

‘माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही।’

अब कहें सभी यह हाय ! विरुद्ध विधाता, 

‘है पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता।’ 

बस मैंने इसका बाह्य-मात्र ही देखा, 

दृढ़ हृदय न देखा, मृदुल गात्र ही देखा, 

परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा, 

इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा! 

युग-युग तक चलती रहे कठोर कहानी –

‘रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी।’

निज जन्म जन्म में सुने जीव यह मेरा – 

‘धिक्कार ! उसे था महा स्वार्थ ने घेरा।’

 

(i) युग-युग तक कौन-सी कठोर कहानी चलती रहेगी?

उत्तर –

 

(ii) रानी कैकेयी को जन्म-जन्मान्तर क्या सुनना पड़ेगा?

उत्तर –

 

(iii) ‘नरदेही’ तथा ‘गात्र’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

 

(iv) रेखांकित अंश का भावार्थ लिखिए।

उत्तर –

 

(v) कविता का शीर्षक तथा कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

प्रश्न-14

वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है-

वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहनकारी हाला है 

मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया – 

मैंने आहति बनकर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है !

मैं कहता हूँ मैं बढ़ता हूँ, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँ 

कुचला जाकर भी धूली-सा आँधी-सा और उमड़ता हूँ

मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने

इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने !

 

(1) कवि किसे रोगी मानता है?

उत्तर –

 

(ii) प्रेम जिनके लिए ‘सम्मोहनकारी हाला’ है, कवि उन्हें क्या मानता है?

उत्तर –

 

(iii) ‘हाला’ तथा ‘असि-धार’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

 

(iv) रेखांकित अंश का भावार्थ लिखिए।

उत्तर –

 

(v) कविता का शीर्षक तथा कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

प्रश्न-15

निरख सखी, ये खंजन आये, 

फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाये। 

फैला उनके तन था आतप, मन से सर सरसाये, 

घुमे वे इस ओर वहाँ, ये हंस यहाँ उड़ छाये ! 

करके ध्यान आज इस जन का निश्चय वे मुसकाये, 

फूल उठे हैं कमल, अधर से यह बन्धूक सुहाये ! 

स्वागत, स्वागत, शरद भाग्य से मैंने दर्शन पाये,

नभ ने मोती वारे, लो, ये अश्रु भर लाये।। 

 

(i) उर्मिला को शरद के विविध रूपों में किसकी छवि दिखाई देती है?

उत्तर –

 

(ii) खंजन की उपमा किससे की गई है?

उत्तर –

 

(iii) उर्मिला अर्घ्य रूप में प्रदान करने के लिए क्या लायी है?

उत्तर –

 

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(v) बन्धूक को अधर के समान क्यों कहा गया है?

उत्तर –

 

प्रश्न-16

सावधान मनुष्य ! यदि विज्ञान है तलवार, 

तो इसे दे फेंक, तजकर मोह, स्मृति के पार। 

हो चुका है सिद्ध, है तू शिशु अभी अज्ञान; 

फूल काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान, 

खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार,

काट लेगी अंग, तीखी है बड़ी यह धार।

 

(i) विज्ञान को तलवार क्यों कहा गया है?

उत्तर –

 

(ii) मनुष्य को शिशु और अज्ञान क्यों बताया गया?

उत्तर –

 

(iii) यहाँ मानव को क्या संदेश दिया गया है?

उत्तर –

 

(iv) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(v) उपर्युक्त पद्यांश के पाठ का शीर्षक और उसके कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

प्रश्न-17

बस मैंने इसका बाह्य-मात्र ही देखा

दृढ़ हृदय न देखा, मृदुल गात्र ही देखा 

परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा 

इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा 

युग-युग तक चलती रहे कठोर कहानी 

‘रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी’। 

निज जन्म-जन्म में सुने जीव यह मेरा 

“धिक्कार! उसे था महास्वार्थ ने घेरा”।

 

(i) प्रस्तुत पद्यांश में किन-किन पात्रों के बीच संवाद हो रहा है?

उत्तर –

 

(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(iii) पाठ के शीर्षक एवं रचयिता के नाम का उल्लेख कीजिए।

उत्तर-

 

(iv) दृढ़ हृदय और मृदुल गात्र शब्द से किसकी ओर संकेत है?

उत्तर –

 

(v) किस पात्र को महास्वार्थ ने घेर लिया था?

उत्तर –

 

प्रश्न-18

 

कौन हो तुम वसंत के दूत

विरस पतझड़ में अति सुकुमार 

घन तिमिर में चपला की रेख 

तपन में शीतल मंद बयार

                  लगा कहने आगन्तुक व्यक्ति 

                  मिटाता उत्कंठा सविशेष 

                  दे रहा हो कोकिल सानन्द 

                  सुमन को ज्यों मधुमय सन्देश।

 

(i) पाठ का शीर्षक एवं कवि का नाम लिखिए।

उत्तर – 

 

(ii) आगन्तुक व्यक्ति से किसकी ओर संकेत किया गया है?

उत्तर –

 

(iii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – 

 

(iv) पद्यांश में किस पात्र की उत्कंठा मिटाने की बात कही गई है?

उत्तर –

 

(v) पद्यांश में किन पात्रों के बीच संवाद हो रहा है?

उत्तर –

 

प्रश्न-19

जाते जाते अगर पथ में क्लान्त कोई दिखावे। 

तो जाके सन्निकट उसकी कलान्तियों को मिटाना। 

धीर-धीरे परस करके गात उत्ताप खोना। 

सदगंधों से श्रमित जन को हर्षितों सा बनाना। 

लज्जाशीला पथिक महिला जो कहीं दृष्टि आये।

होने देना विकृत-वसना तो न तू सुन्दरी को। 

जो थोडी भी श्रमित वह हो गोद ले श्रान्ति खोना।

होंठों की औ कमल-मुख की म्लानताएँ मिटाना।।

 

(i) राधा पवन को क्लान्त व्यक्ति के सम्बन्ध में क्या समझाती है?

उत्तर –

 

(ii) राधा ने पवन को पथिक महिला के साथ कैसा व्यवहार करने के लिए निर्देश दिया?

उत्तर –

 

(iii) ‘कमल-मुख’ में कौन-सा अलंकार है?

उत्तर –

 

(iv) रेखांकित अंश का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

 

(v) उपर्युक्त पद्यांश के पाठ का शीर्षक और उसके कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

प्रश्न-20

जलधि के फूटें कितने उत्स द्वीप-कच्छप ड्वें-उत्तराय; 

किन्तु वह खड़ी रहे दृढ़ मूर्ति अभ्युदय का कर रही उपाय। शक्ति के विद्युत कण, जो व्यस्त विकल बिखरे हैं, हो निरूपाय;

समन्वय उसका करे समस्त विजयिनी मानवता हो जाय।।

 

(1) ‘दृढ़ मूर्ति’ से आशय किसकी मूर्ति से है?

उत्तर –

 

(ii) ‘उत्स’ और ‘अभ्युदय’ शब्दों का अर्थ लिखिए।

उत्तर –

 

(iii) ‘द्वीप कच्छप’ में कौन सा अलंकार है?

उत्तर –

 

(iv) रेखांकित अंश का भावार्थ लिखिए।

उत्तर –

 

(v) पद्यांश के पाठ का शीर्षक और उसके कवि का नाम लिखें।

उत्तर –

 

प्रश्न-21

हे जगजीवन के कर्णधार 

चिर जनन-मरण के आर-पार 

शाश्वत जीवन नौका विहार 

मैं भूल गया अस्तित्व ज्ञान 

जीवन का यह शाश्वत प्रमाण 

करता मुझको अमरत्व दान।

 

(क) कविता का शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

(ख) रेखांकित अंश का भावार्थ लिखिए।

उत्तर – 

 

(ग) ‘कर्णधार’ तथा ‘शाश्वत’ शब्द का अर्थ लिखिए।

उत्तर –

 

(घ) किस अदृश्य सत्ता की ओर पन्त जी का संकेत है?

उत्तर –

 

(ङ) ‘जगजीवन के कर्मधार’ का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – 

 

प्रश्न-22

मुझे फूल मत मारो,

मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो। 

होकर मधु में मीत सदन, पटु, तुम कटु गरल न गारो, 

मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो। 

नहीं भोगिनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो। 

बल हो तो सिन्दूर-बिन्दु यह हरनेत्र निहारो।

 

(क) कविता का शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।

उत्तर – 

 

(ख) इस कविता का सम्बन्ध ‘साकेत’ के किस सर्ग से है?

उत्तर – 

 

(ग) ‘मदन’ तथा ‘गरल’ शब्द का अर्थ लिखिए।

उत्तर –

 

(घ) इस कविता में वर्णित वेदना का सम्बन्ध किस पात्र से है?

उत्तर –

 

(ङ) रेखांकित अंश का भावार्थ लिखिए।

उत्तर –

प्रश्न-23

मेरे प्यारे नव जलद से कंज से नेत्र वाले। 

जाके आये न मधुवन से औ न भेजा सँदेसा। 

मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ। 

जाके मेरी सब दुःख-कथा श्याम को तू सुना दे।।

 

(i) राधा किसके द्वारा कृष्ण को सन्देश भिजवाती है?

उत्तर –

 

(ii) कृष्ण का सौन्दर्य कैसा है? उल्लेख कीजिए।

उत्तर –

 

(iii) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(iv) राधा की मनोदशा का वर्णन कीजिए।

उत्तर –

 

(v) उपर्युक्त पद्यांश का शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।

उत्तर – 

प्रश्न-24

मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने, 

मैं कब कहता हूँ जीवन-मरु नन्दन-कानन का फूल बने? 

काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है, 

मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने?

 

(i) ‘काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है’ का आशय स्पष्ट कीजिए

उत्तर – 

 

(ii) ‘जीवन-मरु’ में कौन-सा अलंकार है?

उत्तर –

 

(iii) मैं किसकी कामना नहीं करता?

उत्तर –

 

(iv) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(v) दिए गए पद्यांश का शीर्षक और कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

प्रश्न-25

दुःख की पिछली रजनी बीच 

विकसता सुख का नवल प्रभात 

एक परदा यह झीना नील 

छिपाए हैं जिसमें सुखगात

जिसे तुम समझे हो अभिशाप 

जगत की ज्वालाओं का मूल 

ईश का वह रहस्य वरदान 

कभी मत जाओ इसको भूल।

 

(क) कवि और कविता का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

(ख) श्रद्धा किसके हताश मन को प्रेरणा दे रही है?

उत्तर –

 

(ग) रजनी किसका प्रतीक है?

उत्तर –

 

(घ) सुख का नवल प्रभात कब आता है?

उत्तर –

 

(ङ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

प्रश्न-26

सुख भोग खोजने आते सब, 

आए तुम करने सत्य खोज। 

जग की मिट्टी के पुतले जन, 

तुम आत्मा के मन के मनोज। 

जड़ता हिंसा स्पर्धा में भर 

चेतना अहिंसा नम्र ओज, 

पशुता का पंकज बना दिया

तुमने मानवता का सरोज।

 

(क) कवि और कविता का शीर्षक लिखिए।

उत्तर – 

 

(ख) मानव नश्वर संसार में आकर किसकी खोज करता है?

उत्तर –

 

(ग) मनुष्य क्या है?

उत्तर –

 

(घ) सत्य की खोज करने कौन आया?

उत्तर –

 

(ङ) रेखांकित पंक्ति की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

प्रश्न-27

जल पंजर गत अब अरे अधीर अभागे 

वे ज्वलित भाव थे स्वयं तुझी में जागे 

पर था केवल क्या ज्वलित भाव ही मन में?

क्या शेष बचा था कुछ न और इस मन में? 

कुछ मूल्य नहीं वात्सल्य मात्र क्या तेरा? 

पर आज अन्य-सा हुआ वत्स भी मेरा 

थूके, मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके 

जो कोई जो कह सके, कहे क्यों चूके?

 

(क) उपर्युक्त पद्यांश का शीर्षक एवं कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

(ख) उपर्युक्त पद्यांश में किससे किसका संवाद हो रहा है?

उत्तर –

 

(ग) वे ज्वलित भाव किसमें जगे थे?

उत्तर –

 

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(ङ) पश्चाताप की अग्नि में कौन जल रहा है?

उत्तर –

प्रश्न-28

नील परिधान बीच सुकुमार 

खुल रहा मृदुल अधखुला अंग, 

खिला हो ज्यों बिजली का फूल 

मेघ-बन बीच गुलाबी रंग। 

ओह! वह मुख! पश्चिम के व्योम 

बीच जब घिरते हों घनश्याम 

अरुण रवि मण्डल उनको भेद 

दिखाई देता हो छविधाम।

 

(क) उपर्युक्त पद्यांश का शीर्षक तथा कवि का नामोल्लेख कीजिए।

उत्तर –

 

(ख) रेखांकित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(ग) ‘मेघ-बन बीच’ में कौन-सा अलंकार है?

उत्तर –

 

(घ) प्रस्तुत पद्यांश में नायिका के मुख की तुलना किससे की गई है?

उत्तर –

 

(ङ) ‘छविधाम’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

प्रश्न-29

दुर्बलता का ही चिह्न विशेष शपथ है, 

पर अबला जन के लिए कौन-सा पथ है? 

यदि मैं उकसाई गई भरत से होऊँ, 

तो पति समान ही स्वयं पुत्र भी खोऊँ। 

ठहरो, मत रोको मुझे, कहूँ सो सुन लो। 

करके पहाड़ सा पाप मौन रह जाऊँ? 

राई-भर-भी अनुताप न करने पाऊँ? 

थी सनक्षत्र राशि-निशा उत्तेस टपकाती, 

रोती थी नीरव सभा हृदय थपकाती।

 

(क) प्रस्तुत पद्यांश के पाठ एवं कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(ग) ‘दुर्बलता का चिह्न’ क्या है? इसे कौन किससे कह रहा है?

उत्तर –

 

(घ) ‘ठहरो, मत रोको मुझे, कहूँ सो सुन लो।’ यह कथन किसका किसके प्रति है?

उत्तर –

 

(ङ) नीरव सभा की क्या स्थिति थी?

उत्तर –

प्रश्न-30

दुःख की पिछली रजनी बीत 

विकसता सूख का नवल प्रभात 

एक परदा यह झीना नील 

छिपाए है जिसमें सुख गात 

जिसे तुम समझे हो अभिशाप, 

जगत् की ज्वालाओं का मूल; 

ईश का वह रहस्य वरदान 

कभी मत इसको जाओ भूल।

 

(क) प्रस्तुत पद्यांश के पाठ एवं कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(ग) ‘नवल’ तथा ‘गात’ शब्दों के अर्थ लिखिए।

उत्तर –

 

(घ) यहाँ ‘तुम’ किसके लिए प्रयुक्त है और वह किसको क्या समझे बैठा है?

उत्तर –

 

(ङ) यह किसका कैसा वरदान है?

उत्तर –

प्रश्न-31

तपस्वी! क्यों इतने हो क्लांत, वेदना का यह कैसा वेग?

आह! तुम कितने अधिक हताश, बताओ यह कैसा उद्वेग?

दुःख की पिछली रजनी बीच, विकसता सुख का नवल प्रभात;

एक परदा यह झीना नील, छिपाए है जिसमें सुख गात।

 

(क) तपस्वी सम्बोधन किसके लिए किया गया है?

उत्तर –

 

(ख) ‘आह!’ शब्द से किस भाव को व्यक्त किया गया है?

उत्तर –

 

(ग) दुःख को रात्रि तथा सुख को नवल प्रभात क्यों कहा गया है?

उत्तर –

 

(घ) ‘एक परदा यह झीना नील’ का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

 

(ङ) पाठ का शीर्षक तथा कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

प्रश्न-32

सावधान मनुष्य! यदि विज्ञान है तलवार, 

तो इसे दे फेंक, तजकर मोह, स्मृति के पार। 

हो चुका है सिद्ध, है तू शिशु अभी अज्ञान; 

फूल काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान, 

खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार, 

काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार।।

 

(क) कवि ने मनुष्य को सावधान क्यों किया है?

उत्तर –

 

(ख) कवि ने किसे फेंक देने के लिए कहा है?

उत्तर – 

 

(ग) मनुष्य को शिशु और अज्ञान क्यों कहा गया है?

उत्तर –

 

(घ) विज्ञान को तलवार क्यों कहा गया है?

उत्तर –

 

(ङ) यह पद्यांश किस महाकाव्य का अंश है?

उत्तर –

प्रश्न-33

मेरे प्यारे नव जलद से कंज से नेत्र वाले। 

जाके आये न मधुवन से औ न भेजा सँदेसा। 

मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ। 

जा के मेरी सब दुःख कथा श्याम को तू सुना दे।।

ज्यों ही मेरा भवन तज तू अल्प आगे बढ़ेगी। 

शोभावाली सुखद कितनी मंजू कुँजें मिलेंगी। 

प्यारी छाया मृदुल स्वर से मोह लेंगी तुझे वे। 

तो भी मेरा दुःख लख वहाँ जा न विश्राम लेना।।

 

(क) सन्देश प्रेषिका ने ‘नव जलद से कंज से नेत्र वाले’ शब्द किसके लिए प्रयोग किया है?

उत्तर –

 

(ख) मधुवन जाकर किसने कोई सन्देश नहीं भेजा?

उत्तर –

 

(ग) ‘बावली’ और ‘अल्प’ शब्दों का अर्थ लिखिए।

उत्तर –

 

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(ङ) उपर्युक्त पद्यांश से सम्बन्धित कविता का शीर्षक तथा उसके रचयिता लिखिए।

उत्तर –

प्रश्न-34

सुख भोग खोजने आते सब, 

आये तुम करने सत्य खोज, 

जग की मिट्टी के पुतले जन 

तुम आत्मा के, मन के मनोज! 

जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर 

चेतना,अहिंसा, नम्र ओज, 

पशुता का पंकज बना दिया 

तुमने मानवता का सरोज

 

(क) इस दुनिया में सब लोग क्या खोजने आते हैं?

उत्तर –

 

(ख) ‘बापू’ ने ‘पशुता के पंकज’ को क्या बना दिया?

उत्तर –

 

(ग) ‘स्पर्धा’ और ‘अहिंसा’ शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

 

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(ङ) उपर्युक्त पद्यांश से सम्बन्धित कविता का शीर्षक तथा उसके रचयिता लिखिए।

उत्तर –

प्रश्न-35

कहते आते थे यही अभी नरदेही,

‘माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही।’ 

अब कहें सभी यह हाय! विरुद्ध विधाता,

‘है पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता।’

बस मैंने इसका बाह्य-मात्र ही देखा,

दृढ़ हृदय न देखा, मृदुल गात्र ही देखा,

परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा, 

इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा!

युग-युग तक चलती रहे कठोर कहानी

‘रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी।’ 

 

(क) नरदेही अभी तक क्या कहते आ रहे थे?

उत्तर –

 

(ख) युग-युग तक क्या कठोर कहानी चलती रहेगी?

उत्तर –

 

(ग) ‘गात्र’ तथा ‘परमार्थ’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

 

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(ङ) उपर्युक्त कविता का शीर्षक तथा कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

प्रश्न-36

यह मनुज, जो सृष्टि का श्रृंगार

ज्ञान का, विज्ञान का, आलोक का आगार।

‘व्योम से पाताल तक सब कुछ इसे है ज्ञेय’

पर, न यह परिचय मनुज का, यह न उसका श्रेय। 

श्रेय उसका बुद्धि पर चैतन्य उर की जीत, 

श्रेय मानव की असीमित मानवों से प्रीत, 

एक नर से दूसरे के बीच का व्यवधान 

तोड़ दे जो, बस, वही ज्ञानी, विद्वान्

 

(क) इस सृष्टि में मनुष्य का क्या महत्त्व है?

उत्तर –

 

(ख) मानव-जीवन का क्या श्रेय होना चाहिए?

उत्तर –

 

(ग) ‘आगार’ और ‘व्यवधान’ शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

 

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर –

 

(ङ) उपर्युक्त कविता का शीर्षक तथा कवि का नाम लिखिए।

उत्तर –

 

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